महाराज धृतराष्ट्र ने कहा — हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में बड़े उत्साह के साथ युद्ध के लिए एकत्रित होकर मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
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राजा धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन होने के अतिरिक्त आध्यात्मिक ज्ञान से भी वंचित था। अपने पुत्रों के प्रति अथाह मोह के कारण वह सत्यपथ से च्युत हो गया था और पाण्डवों के न्यायोचित राज्याधिकार को हड़पना चाहता था। अपने भतीजों पाण्डव पुत्रों के प्रति उसने जो अन्याय किया था, उसका उसे भलीभांति बोध था। इसी अपराध बोध के कारण वह युद्ध के परिणाम के संबंध में चिन्तित था। इसलिए धृतराष्ट्र संजय से कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि जहाँ युद्ध होने वाला था-की घटनाओं के संबंध में जानकारी ले रहा था।
इस श्लोक में धृतराष्ट्र ने संजय से यह प्रश्न पूछा कि उसके और पाण्डव पुत्रों ने युद्धभूमि में एकत्रित होने के पश्चात् क्या किया? अब यह एकदम स्पष्ट था कि वे युद्धभूमि में केवल युद्ध करने के उद्देश्य के लिए एकत्रित हुए थे। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि वे युद्ध करेंगे। धृतराष्ट्र को ऐसा प्रश्न करने की आवश्यकता क्यों पड़ी कि उन्होंने युद्धभूमि में क्या किया?
धृतराष्ट्र द्वारा 'धर्म क्षेत्रे', धर्मभूमि शब्द का प्रयोग करने से उसकी आशंका का पता चलता है। कुरुक्षेत्र पवित्र भूमि थी। शतपथ ब्राह्मण में इसका वर्णन 'कुरुक्षेत्र देव यजनम्' के रूप में किया गया है अर्थात 'कुरुक्षेत्र स्वर्ग की देवताओं की तपोभूमि है।' इसलिए इस भूमि पर धर्म फलीभूत होता है। धृतराष्ट्र आशंकित था कि कुरुक्षेत्र की पावन धर्म भूमि के प्रभाव के परिणामस्वरूप उसके पुत्रों में कहीं उचित और अनुचित में भेद करने का ऐसा विवेक जागृत न हो जाए कि वे यह सोचने लगें कि अपने स्वजन पाण्डवों का संहार करना अनुचित और धर्म विरूद्ध होगा और कहीं ऐसा विचार कर वे शांति के लिए समझौता करने को तैयार न हो जाएं। इस प्रकार की संभावित आशंकाओं के कारण धृतराष्ट्र के मन में अत्यंत निराशा उत्पन्न हुई। वह सोचने लगा कि यदि उसके पुत्रों ने युद्ध विराम या संधि का प्रस्ताव स्वीकार किया तो पाण्डव निरन्तर उनकी उन्नति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करेंगे। साथ ही साथ वह युद्ध के परिणामों के प्रति भी संदिग्ध था और अपने पुत्रों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति सुनिश्चित होना चाहता था। इसलिए उसने संजय से कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में हो रही गतिविधियों के संबंध में पूछा। जहाँ दोनों पक्षों की सेनाएं एकत्रित हुई थीं।
संजय ने उत्तर दिया — हे महाराज! पाण्डव-सेना की व्यूहरचना को परखकर आपके पुत्र दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के निकट गए, और कहने लगे —
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धृतराष्ट्र इस बात की पुष्टि करना चाहता था कि क्या उसके पुत्र अब भी युद्ध करने के उत्तरदायित्व का निर्वहन करेंगे? संजय धृतराष्ट्र के इस प्रश्न के तात्पर्य को समझ गया और उसने ऐसा कहकर कि पाण्डवों की सेना व्यूह रचना कर युद्ध करने को तैयार है, यह पुष्टि की कि युद्ध अवश्य होगा। फिर उसके पश्चात् उसने वार्ता का विषय बदलते हुए यह बताया कि दुर्योधन क्या कर रहा था।
धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन निर्दयी और दुष्ट प्रवृत्ति का था। धृतराष्ट्र के जन्मांध होने के कारण व्यावहारिक रूप से हस्तिनापुर के शासन की बागडोर दुर्योधन के हाथों में थी। वह पाण्डवों के साथ अत्यधिक ईर्ष्या करता था और कठोरता से उनका दमन करना चाहता था ताकि वह हस्तिनापुर पर निर्विरोध शासन कर सके। उसने यह कल्पना की थी कि पाण्डव कभी भी इतनी विशाल सेना एकत्रित नही कर सकते जो उसकी सेना का सामना कर सके। किन्तु अपने आंकलन के विपरीत पाण्डवों की विशाल सेना को देखकर दुर्योधन व्याकुल और हतोत्साहित हो गया।
ऐसे में दुर्योधन का अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाना यह दर्शाता है कि वह युद्ध के परिणाम के संबंध में भयभीत था। वह द्रोणाचार्य के प्रति अपना आदर प्रकट करने का ढोंग करते हुए, उनके पास गया किन्तु वास्तव में वह अपनी चिन्ता को कम करना चाहता था। इसलिए उसने अगले श्लोक से लेकर आगे के नौ श्लोकों में इस प्रकार से कहा।
हे महान आचार्य! उस ओर देखिए, आपके मेधावी शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा संगठित, महान पाण्डव-सेना की व्यूहरचना को।
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दुर्योधन एक कुशल कूटनीतिज्ञ के रूप में अपने सेनापति गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अतीत में की गई भूल को इंगित करना चाहता था। द्रोणाचार्य का राजा द्रुपद के साथ किसी विषय पर राजनैतिक विवाद था। उस विवाद के कारण क्रोधित होकर द्रुपद ने प्रतिशोध की भावना से यज्ञ किया
और यह वरदान प्राप्त किया कि उसे ऐसे पुत्र की प्राप्ति होगी जो द्रोणाचार्य का वध करने में समर्थ होगा। इस वरदान के फलस्वरूप उसका धृष्टद्युम्न के नाम से पुत्र हुआ। यद्यपि द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्न के जन्म का रहस्य जानते थे किन्तु जब द्रुपद ने अपने पुत्र धृष्टद्युम्न को सैन्य कौशल की विद्या प्रदान करने के लिए द्रोणाचार्य को सौंपा तब उदारचित द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को सैन्य युद्ध की विद्या में निपुण बनाने में कोई संकोच और भेदभाव नही किया। अब धृष्टद्युम्न पाण्डवों के पक्ष से उनकी सेना के महानायक के रूप में उनकी सेना की व्यूह रचना कर रहा था। ऐसे में दुर्योधन अपने गुरु को यह अवगत कराना चाहता था कि अतीत में की गई उनकी भूल के कारण ही उसे वर्तमान में संकट का सामना करना पड़ रहा है और वह यह भी इंगित करना चाहता था कि उन्हें आगे पाण्डवों के साथ युद्ध करने में किसी प्रकार की उदारता नहीं दर्शानी चाहिए।
शौर्यवान युधामन्यु, साहसी उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र, ये सभी निःसंदेह महारथी हैं।
758
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥१-७॥
asmākaṁ tu viśiṣṭā ye tānnibodha dvijottama |
nāyakā mama sainyasya saṁjñārthaṁ tānbravīmi te || 1-7 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यद्यपि, हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! आपको यह भी जानना चाहिए कि हमारी सेना में कौन हमारे सैन्य बल का नेतृत्व करने के योग्य हैं। आपकी जानकारी के लिए मैं उनके नाम दोहराता हूँ।
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यहाँ कौरव सेना के प्रधान सेनापति द्रोणाचार्य को दुर्योधन ने 'द्विजोत्तम' अर्थात् ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ कहकर संबोधित किया। उसने जान बूझकर अपने गुरु को इस प्रकार संबोधित किया। द्रोणाचार्य वृत्ति से योद्धा नही थे, वे मात्र सैन्य शिक्षा के आचार्य थे। एक कपटी नायक के रूप में दुर्योधन अपने मन में अपने गुरु की निष्ठा पर निर्लज्जतापूर्वक संदेह कर रहा था। दुर्योधन के शब्दों में छिपा अर्थ यह था कि यदि द्रोणाचार्य पराक्रम से युद्ध नहीं लड़ते तो उन्हें मात्र एक ब्राह्मण ही माना जाएगा जिसकी रुचि दुर्योधन के राज्य में केवल उत्तम जीविका अर्जित करने और सुख सुविधाएं भोगने की होगी।
ऐसा कहकर अब दुर्योधन अपना और अपने गुरु के मनोबल को बढ़ाना चाहता था और इसलिए वह अपनी सेना के महासेनानायकों की गणना करने लगा।
801
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥१-८॥
ये सभी अनेकानेक अस्त्र-शस्त्रों से लैस हैं और ये युद्ध की कला में प्रवीण हैं। ये एवं कई अन्य योद्धा भी मेरे लिए अपने प्राण तक न्योछावर करने के लिए तैयार हैं।
भीष्म के पराक्रम द्वारा संरक्षित हमारा सैन्य बल असीमित है। दूसरी ओर, भीम द्वारा संरक्षित विपक्ष का सैन्य बल सीमित है।
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दुर्योधन के आत्म प्रशंसा करने वाले ये शब्द मिथ्याभिमान करने वाले मनुष्यों की उक्ति जैसे थे। जब उन्हें अपना अन्त निकट दिखाई देता है तब स्थिति का आंकलन करने के पश्चात् आत्मप्रशंसा करने वाले व्यक्ति अभिमानपूर्वक मिथ्या गर्व करने लगते हैं। अपने भविष्य के प्रति अनर्थकारी व्यंग्योक्ति दुर्योधन के कथन में तब अभिव्यक्त हुई जब उसने कहा कि भीष्म पितामह द्वारा संरक्षित उनकी शक्ति असीमित थी।
भीष्म पितामह कौरव सेना के प्रधान सेनापति थे। उन्हें इच्छा मृत्यु और अपनी मृत्यु का समय निश्चित करने का वरदान प्राप्त था जिससे वह अजेय कहलाते थे। पाण्डव पक्ष की सेना भीम के संरक्षण में थी जो दुर्योधन का जन्मजात शत्रु था। इसलिए दुर्योधन ने भीष्म के साथ भीम की अल्प शक्ति की तुलना की। भीष्म कौरव और पाण्डवों के पितामह थे और वे वस्तुतः दोनों पक्षों का कल्याण चाहते थे। पाण्डवों के प्रति करुणा भाव भीष्म पितामह को तन्मयता से युद्ध करने से रोकता था। वे यह भी जानते थे कि इस धर्मयुद्ध में भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से उपस्थित थे और संसार की कोई भी शक्ति अधर्म का पक्ष लेने वालों को विजय नहीं दिला सकती। इसलिए भीष्म पितामह ने अपने नैतिक उत्तरदायित्व का पालन करने और हस्तिनापुर एवं कौरवों के हित की रक्षा हेतु पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध करने का निर्णय लिया। यह निर्णय भीष्म पितामह के व्यक्तित्व की गहनता को रेखांकित करता है।
930
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥१-११॥
ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgamavasthitāḥ |
bhīṣmamevābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi || 1-11 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
आपको किसी भी कीमत पर सभी सामरिक बिंदुओं में, अपने-अपने मोर्चे पर डटे रहकर पितामह भीष्म की सहायता एवं उनको पूर्ण संरक्षण प्रदान करना है।
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दुर्योधन यह समझ गया था कि भीष्म पितामह मानसिक रूप से पाण्डवों के विरुद्ध आक्रान्त होकर युद्ध लड़ने को इच्छुक नही हैं जिसके कारण वे सैनिकों को वीरता और उत्साह से युद्ध करने के लिए प्रेरित नही करेंगे। इसलिए उसने अपनी सेना के अन्य सेना नायकों से अपनी-अपनी स्थिति पर अडिग रहने के साथ-साथ चारों ओर से भीष्म पितामह की सुरक्षा का भी ध्यान रखने को कहा।
973
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सारश्लोक 11 के पश्चात चिंतन
इस संसार में युद्ध कोई नई बात नहीं है। हज़ारों वर्ष पहले भी कुरुक्षेत्र जैसा युद्ध, सही और गलत के बीच की असहमति का निश्चय करने एवं लौकिक धन-सम्पत्ति के लाभ हेतु होते थे। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक, इस धरती पर एक भी दिन ऐसा नहीं बीता है कि कहीं पर किसी कारण से युद्ध न हो रहा हो। यदि हम इतिहास में देखें तो लोग धन-सम्पत्ति के लोभ एवं कीर्ति हेतु, कभी-कभी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए एकत्रित हुए हैं, लेकिन अधिकतर नीचता से ही हुए हैं। यही शृंखला अब इस इक्कीसवीं सदी में स्वयं को दोहरा रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध मानव सभ्यता में उनके कर्मों के भाग्य की एक अपरिहार्य नियति है।
दूसरी ओर, शांति प्राप्त करना कठिन है। शांति पर चर्चा तो होती है, उसके लिए प्रार्थना भी की जाती है, किंतु कदाचित ही क्षणभर से अधिक समय के लिए उसके दर्शन होते हैं। सभी का अधिकतम जीवनकाल, भले ही वह कितने ही सरल क्यों न हों, या तो अपने सामाजिक, या राजनीतिक, या आर्थिक, या मानसिक, या शारीरिक अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष में ही कट जाता है। लगभग सभी के लिए, किसी भी बड़े संकटकाल का अल्पकालिक अभाव ही शांति कहलाती है। परन्तु शांति तो प्रज्ञा की एक अवस्था है, न कि इस भौतिक जगत के बाहरी मामलों से संबंधित कोई दशा। शांति तो एक आंतरिक अनुभूति होती है।
वेद-शास्त्रों की प्रज्ञता – श्रीमद्भागवतम् में कहा गया है, जीवो जीवस्य जीवनम् – एक जीव दूसरे जीव का आहार बनता है। अत्यंत आणविक जीव-राशियों से लेकर सबसे विकसित जीव-राशियों तक, एक जीव का पोषण किसी अन्य जीव के विनाश से ही होता है। अतएव, भौतिक अस्तित्व का आधारभूत सिद्धांत ही मूलतः हिंसाग्रस्त होने के कारण दोषपूर्ण है। अतः शांति, लगभग हम सभी के लिए, अपने निर्दिष्ट कार्य के निर्वाह से, तथा इस विश्वास से प्राप्त होती है कि हमने जो किया, वह सही किया। इसी विचार में युद्ध और शांति के बीच का सूक्ष्म भेद निहित है – जिसे हम सही मानते हैं, या जिस विचार को मानने के लिए हम अनुकूलित हैं, दरअसल क्या वह सही है?
सही और गलत, या कुछ मामलों में पुण्य और पाप में अंतर पहचानने की क्षमता, व्यापक रूप से हमारे ज्ञान के विस्तार पर आधारित होती है जहाँ से हम अपने निष्कर्ष निकालते हैं। स्वाभाविक है कि अपर्याप्त जानकारी हमें गलत निष्कर्ष पर पहुँचाती है। इसलिए ज्ञान के महत्तम स्रोत को खोज निकालना, परम सत्य के ज्ञान को खोज निकालना और उस ज्ञान की साधना करना ही हमारे परम हित में है।
सारे विश्व में भगवद्गीता ही संभवतः व्यापक रूप से सबसे अधिक पठित ईश्वरवाद पर आधारित ग्रन्थ है। जो कुछ भी ज्ञान हम अन्य सदृश ग्रन्थों, जैसे कि धम्मपद, बाइबल, तोराह, कुरान आदि में प्राप्त कर सकते हैं, वह सब कुछ भगवद्गीता में भी उपलब्ध है। किंतु भगवद्गीता में ऐसा ज्ञान भी है जिसे और कहीं भी पाया नहीं जा सकता। अतएव भगवद्गीता, ज्ञान की सभी अन्य शाखाओं से उत्कृष्ट है। आगे इन अनुवृत्तियों में भगवद्गीता में निहित परम सत्य के ज्ञान की विस्तीर्णता की एक झलक प्रस्तुत की गई है।
युद्धभूमि के दूसरी ओर, श्वेत वर्ण के सुंदर घोड़ों से जुड़े हुए भव्य रथ पर विराजमान माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन दोनों ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाए।
आकाश एवं धरती में गूँजती हुई उस भीषण ध्वनि-उद्घोष ने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।
1360
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सारश्लोक 19 के पश्चात चिंतन
कुरुक्षेत्र युद्ध के आरंभ में ही दुर्योधन ने अपने विरोधियों के बल का कम आकलन कर एक सामरिक भूल की। संभवतः राज्य प्राप्ति के लोभ से अंधे होकर, या चचेरे भाइयों पाण्डवों से अपने पुराने द्वेष के कारण, वह इस युद्ध में यह सोचकर सम्मिलित हुआ कि उसके विरोधियों का बल काफी सीमित है।
निस्संदेह, द्वेष और लोभ विवेक के अमंगलकारी साथी हैं, जिसके द्वारा गलत निष्कर्ष होते हैं एवं जीवन की निरर्थक क्षति होती है। उदाहरण के तौर पर, आधुनिक समय में वियतनाम, इराक़ और अफगानिस्तान के युद्ध से बेहतर अन्य कोई उदाहरण नहीं दिया जा सकता, जहाँ पर जनता की इच्छा को अनदेखा कर असंख्य निर्दोष प्राणों का नुकसान हुआ।
भगवद्गीता के सभी पारंपरिक टीकाकारों ने कुरुक्षेत्र में दुर्योधन की इस भूल को दर्शाया है। विशेषतः उन्होंने यह सूचित किया है कि दुर्योधन ने यह नहीं पहचाना कि जब परम-पुरुष श्रीकृष्ण ही स्वयं अर्जुन का मार्गदर्शन करने के लिए उनके सारथी बने हैं, तो अर्जुन अवश्य ही सबसे दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी होगा।
इतिहास इस बात को दर्शाता है कि युद्ध लोभ, द्वेष, या मतभेदों के कारण किए जाते हैं। किन्तु यह सोचना कि "ईश्वर हमारी ओर हैं", यह केवल एक सहूलियत की बात है। यह विचार कि "ईश्वर हमारी ओर हैं", अवश्य एक सांत्वना देने वाला विचार है, और सेनाओं ने इसी सांत्वना के बलबूते पर इतिहास के लगभग सभी युद्ध लड़े हैं। समस्या सर्वदा यही रही है कि दोनों पक्ष धार्मिकता का झंडा उठाकर बस यही ठान लेते हैं कि "यह ईश्वर की इच्छा है!" इस चित्तवृत्ति को कभी-कभी "सुगमता का सिद्धांत" (Theology of convenience) कहा जाता है।
तो प्रश्न यह उठता है कि कैसे कुरुक्षेत्र का युद्ध इन आधुनिक समय के युद्धों से भिन्न है? अंतर यह है कि कुरुक्षेत्र का युद्ध इसलिए नहीं हुआ था कि एक पक्ष का धार्मिक मत दूसरे से भिन्न था। कुरुक्षेत्र एक भ्रातृघातक युद्ध था — सत्ता का लोभ, धर्म का उल्लंघन, ईर्ष्या, पारिवारिक बंधन, और स्वयं को केवल एक स्थूल शरीर समझ लेना, आदि जैसे मानवीय दोषों के माध्यम से उत्पादित एक कुल-वैर था।
किंतु इतिहास के किसी भी अन्य युद्ध के विपरीत कुरुक्षेत्र का युद्ध सभी भावी पीढ़ियों के कल्याण के लिए एक अगाध सबक दर्ज कर गया है। यह सबक श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के रूप में सिखाया है — ऐसा सबक जो मानवजाति को अपनी सांसारिक कमजोरियों से उबरने, आध्यात्मिक चेतना में स्थित होने व आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति के योग्य बनाता है।
हे राजन्! उस समय शस्त्र-प्रहार आरम्भ होने ही वाला था कि हनुमानजी की ध्वजा से युक्त रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए व्यूहबद्ध देखकर अपना धनुष उठाया और हृषीकेश श्रीकृष्ण से ये वचन कहे।
अर्जुन ने कहा — हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की अभिलाषा से खड़े इन योद्धाओं को देख सकूँ कि इस रणक्षेत्र में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है।
संजय ने कहा — हे भरतवंशी राजन्! गुड़ाकेश अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृषीकेश श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच उस उत्तम रथ को लाकर खड़ा कर दिया।
1575
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 25
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥१-२५॥
वहाँ अर्जुन ने दोनों ही सेनाओं में उपस्थित अपने पितृतुल्य परिजनों, पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वशुरों और शुभचिन्तकों को देखा।
1661
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 27
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥१-२७॥
उन सभी उपस्थित बन्धु-बान्धवों को देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से अभिभूत हो गए और विषाद करते हुए इस प्रकार बोले।
1704
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 28
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥१-२८॥
arjuna uvāca |
dṛṣṭvemaṁ svajanaṁ kṛṣṇa yuyutsuṁ samupasthitam |
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ ca pariśuṣyati || 1-28 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण! युद्ध की अभिलाषा से सामने खड़े अपने इन स्वजनों को देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है।
1747
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सारश्लोक 28 के पश्चात चिंतन
श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने, इसलिए उन्हें पार्थसारथी के रूप में भी जाना जाता है। चूँकि श्रीकृष्ण अर्जुन के परम मित्र एवं सखा थे, अर्जुन ने उनसे अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने का अनुरोध किया, ताकि वह यह देख सके कि उसे किसके विरुद्ध युद्ध करना है। परन्तु शत्रुओं के रूप में अपने ही स्वजनों को देखकर अर्जुन अचम्भित हुए और मोह में पड़ गए।
कुरुक्षेत्र का पावन मंच अब पूर्ण रूप से तैयार हो चुका था जहाँ से भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश देने वाले थे। शोक से व्याकुल अर्जुन अपने कर्तव्य से विचलित होने लगे। क्षत्रिय होने के नाते धर्मरक्षा हेतु युद्ध करना उनका स्वाभाविक कर्तव्य था, किन्तु अपने समक्ष खड़ी इस विषम परिस्थिति को देखकर उनके पैर डगमगाने लगे।
यह संसार दोषों, संकटों, क्रूरताओं और शोषणकारी प्रवृत्तियों से भरा है। जैसा कि चिन्तक एडमंड बर्क ने कहा था — "अधर्म के विजयी होने का एकमात्र कारण यही है कि अच्छे लोग चुपचाप सब देखते रहें और विरोध में कुछ न करें।"
अर्जुन ने मन ही मन युद्ध से विरत होने का विचार किया, यह सोचकर कि कुल के नाश से परम्परा नष्ट हो जाएगी और सर्वत्र अमङ्गल होगा। परन्तु वे अन्तर्मन से यह भी जानते थे कि अधर्म के समक्ष मौन रहने का परिणाम और भी अधिक दुष्कर एवं विनाशकारी सिद्ध होगा।
api trailokyarājyasya hetoḥ kiṁ nu mahīkṛte |
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana || 1-35 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे जनार्दन! तीनों लोकों के राज्य के बदले भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता, फिर इस तुच्छ पृथ्वी के राज्य के लिए तो कहना ही क्या? धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करके हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी?
2091
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 36
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥१-३६॥
इन आततायियों का वध करने पर भी हमें पाप ही लगेगा। अतः अपने बान्धवों कौरवों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव! अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?
2134
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 37
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥१-३७॥
yadyapyete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |
kulakṣayakṛtaṁ doṣaṁ mitradrohe ca pātakam || 1-37 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यद्यपि लोभ से भ्रष्ट बुद्धि वाले ये कौरव कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों से द्रोह करने के महापाप को नहीं देख पा रहे हैं —
2177
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 38
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥१-३८॥
अहो! कितना बड़ा आश्चर्य और खेद है कि हम सब जानते हुए भी यह महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो केवल राज्य और सुख के लोभ से अपने स्वजनों का संहार करने पर उतारू हैं!
2478
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 1 • श्लोक क्रमांक 45
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥१-४५॥
यदि हाथों में शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रणभूमि में मुझ शस्त्ररहित और प्रतिकार न करने वाले का वध भी कर दें, तो वह भी मेरे लिए परम कल्याणकारी होगा।
संजय ने कहा — युद्धभूमि में इस प्रकार कहकर, शोकविह्वल चित्त वाले अर्जुन ने अपने बाणसहित धनुष को नीचे रख दिया और रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
2564
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सारश्लोक 46 के पश्चात चिंतन
आलङ्कारिक रूप से अर्जुन के लिए दोनों ओर विषम संकट था। इसलिए अर्जुन ने समझदारी दिखाते हुए परमेश्वर श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन माँगा। यह जानते हुए कि श्रीकृष्ण स्वयं परमसत्य, सकल ऐश्वर्य एवं ज्ञान के स्रोत हैं, अर्जुन ने उन्हें विभिन्न नामों से पुकारा — हृषीकेश (इन्द्रियों के नियन्ता), अच्युत (अचूक), केशव (केशि दानव का संहार करने वाले), गोविन्द (इन्द्रियों व गौओं को आनन्द देने वाले), मधुसूदन (मधु दैत्य के संहारक), जनार्दन (समस्त जीवों के रक्षक), माधव (लक्ष्मीपति) एवं वार्ष्णेय (वृष्णिवंशी)।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को इन नामों से इसलिए सम्बोधित किया क्योंकि वे धर्मसंकट में पड़कर उनकी करुणामयी कृपा का आह्वान कर रहे थे। श्रीकृष्ण हृषीकेश हैं, अतः वे कभी मोह अथवा माया के वशीभूत नहीं हो सकते। वे अच्युत हैं, अतः उनका निर्णय कभी त्रुटिपूर्ण नहीं हो सकता। अर्जुन को ऐसे दिव्य उपदेश की आवश्यकता थी जो उनके विचलित मन को शान्त कर सके।
श्रीकृष्ण केशव हैं, जिन्होंने केशि दानव का वध किया था, जो दम्भ और अहंकार का प्रतीक है। भगवान् द्वारा लीलाओं में किए गए दानवों के संहार हमारे आध्यात्मिक पथ की आसुरी वृत्तियों — काम, क्रोध, लोभ, मोह और कपट के विनाश को दर्शाते हैं। अर्जुन को विश्वास था कि श्रीकृष्ण के शरणागत होने से उनकी समस्त दुविधाएँ समाप्त हो जाएँगी। श्रीकृष्ण को वार्ष्णेय कहकर अर्जुन कुलपरम्परा के महत्त्व का स्मरण करा रहे थे, क्योंकि इन्हीं परम्पराओं का सम्भावित विनाश ही उनकी सबसे बड़ी व्यथा थी।
ॐ तत् सत् — महर्षि वेदव्यास-प्रणीत शतसहस्र श्लोकों वाले श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में समाविष्ट, उपनिषद् रूप, ब्रह्मविद्या एवं योग-शास्त्र स्वरूप श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में "सैन्य-दर्शन" नामक प्रथम अध्याय सम्पूर्ण हुआ।
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दैनिक गीता स्वाध्याय
प्रतिदिन एक श्लोक सुनें और अपने जीवन में उतारें
श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक का मूल संस्कृत पाठ, हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में सटीक व्याख्या तथा उच्च कोटि का शांत स्वर सुनिए।