श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 1
श्रीभगवानुवाच ।
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१४-१॥
śrībhagavānuvāca | paraṁ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṁ jñānamuttamam | yajjñātvā munayaḥ sarve parāṁ siddhimito gatāḥ || 14-1 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
भगवान श्री कृष्ण ने कहा - अब मैं तुमसे उस ज्ञान का वर्णन करता हूँ जो सभी प्रकार के ज्ञानों में सर्वोपरि है। इसे जानकर, सभी ऋषि गण सिद्धि प्राप्त कर सके और अपने परम गंतव्य तक पहुंच सके।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥१४-२॥
idaṁ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ | sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca || 14-2 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
इस ज्ञान का आश्रय लेकर व्यक्ति मेरी दिव्य प्रकृति प्राप्त कर लेता है। वह ना तो सृष्टि के समय जन्म लेता है न वह प्रलय के समय व्यथित होता है।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 2 के पश्चात चिंतन
पिछले अध्यायों में भौतिक प्रकृति के गुणों - सत्त्व-गुण, रजो-गुण और तमो-गुण का उल्लेख किया गया है और इस अध्याय में उनका विस्तार से वर्णन किया जाएगा। यह भी वर्णित किया जाएगा कि व्यक्ति कैसे भौतिक गुणों से परे होकर जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 3
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥१४-३॥
mama yonirmahadbrahma tasmingarbhaṁ dadhāmyaham | sambhavaḥ sarvabhūtānāṁ tato bhavati bhārata || 14-3 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे भारत, भौतिक प्रकृति का विशाल विस्तार मेरा गर्भ है जिसे मैं गर्भाधान करता हूँ और जहां से सभी जीवित प्राणी प्रकट होते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 4
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥१४-४॥
sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ | tāsāṁ brahma mahadyonirahaṁ bījapradaḥ pitā || 14-4 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे कुंती पुत्र, इस दुनिया में जन्म लेने वाले सभी प्रकार के जीवन अंततः भौतिक प्रकृति के महान गर्भ से पैदा होते हैं, और मैं ही बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 5
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥१४-५॥
sattvaṁ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ | nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam || 14-5 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
सत्त्व, रजो और तमो गुण भौतिक प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। हे महाबाहु, प्रकृति के ये गुण अव्यय जीव को भौतिक शरीर से बांधते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥१४-६॥
tatra sattvaṁ nirmalatvātprakāśakamanāmayam | sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha || 14-6 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे निष्पाप अर्जुन! इन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल होता है। यह ज्ञान प्रदान कर व्यथा से मुक्त करता है। यह मनुष्य को आनंद और ज्ञान के लिए अनुकूलित करता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 7
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥१४-७॥
rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam | tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam || 14-7 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे कुंती पुत्र, यह जानो कि रजोगुण इच्छा, ललक और आसक्तियों को उत्पन्न करता है। यह देहबद्ध जीवों को उनके कर्मों से बांधता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥१४-८॥
tamastvajñānajaṁ viddhi mohanaṁ sarvadehinām | pramādālasyanidrābhistannibadhnāti bhārata || 14-8 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे भारत, यह जानो कि तमोगुण सभी जीवों को भ्रमित करता है। यह उन्हें भ्रम, आलस्य और अत्यधिक नींद के माध्यम से बांधता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 9
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥१४-९॥
sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata | jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramāde sañjayatyuta || 14-9 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे भारत, सत्वगुण व्यक्ति को सुख के लिए अनुकूलित करता है, रजोगुण आसक्तियों को उत्पन्न करता है जिससे व्यक्ति कर्मों के बंधन में बंध जाता है, और तमोगुण ज्ञान को आवृत करके भ्रम पैदा करता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१४-१०॥
rajastamaścābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata | rajaḥ sattvaṁ tamaścaiva tamaḥ sattvaṁ rajastathā || 14-10 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण को परास्त कर देता है; रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण को परास्त कर देता है; तो कभी तमोगुण, सत्त्वगुण और रजोगुण को परास्त कर देता है। इस प्रकार ये गुण आपस में वर्चस्व के लिए सदैव लड़ते रहते हैं।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 10 के पश्चात चिंतन
भौतिक प्रकृति की तुलना एक गर्भ से की जाती है और श्री कृष्ण कहते हैं कि वे इस गर्भ के बीज देने वाले पिता (अहं बीज-प्रदः पिता) हैं। भौतिक प्रकृति और जीवों का संयोजन इस प्रकार है कि वे अनेक जीवराशियों को उत्पन्न करते हैं, जो भौतिक प्रकृति के गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से बंधे होते हैं और उनके प्रभाव के अंतर्गत कार्य करने के लिए मजबूर होते हैं। सत्त्वगुण की विशेषता यह है कि यह अशुद्धियों से रहित है, जो व्यक्ति को ज्ञान प्रदान कर व्यथा से मुक्त करता है, आनंद की अनुभूति देता है, और सिद्धि की ओर ले जाता है। रजोगुण अत्यधिक इच्छा, ललक और आसक्तियों को उत्पन्न करता है और जीवों को कर्मों के बंधन से बाध्य करता है। तमोगुण वह है जो सभी देहबद्ध जीवों को व्यग्र करता है और भ्रम, आलस्य एवं अत्यधिक नींद के माध्यम से विवश करता है।
इस तरह, भौतिक प्रकृति के तीन गुण व्यक्ति को सुख के भ्रम, कर्मों के बंधन, तथा अज्ञान की व्यग्रता से बांधे रखते हैं। प्रकृति के तीनो गुणों के संयोजन अंतहीन हैं एवं प्रत्येक गुण एक दुसरे से प्रधानता के लिए लड़ते रहते हैं। इसके कारण, देहबद्ध जीव सदैव भ्रम की स्थिति में रहते हैं और परिणामस्वरूप जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के दुःख से सदैव व्यथित रहते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥१४-११॥
sarvadvāreṣu dehe'sminprakāśa upajāyate | jñānaṁ yadā tadā vidyādvivṛddhaṁ sattvamityuta || 14-11 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जब ज्ञान का प्रकाश शरीर की सभी इंद्रियों को प्रकाशित करता है, तो यह समझा जाना चाहिए कि सत्त्वगुण सबसे अधिक प्रबल है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृह ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१४-१२॥
lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā | rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha || 14-12 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे भरत वंश के सर्वश्रेष्ठ, जब रजोगुण सबसे अधिक प्रबल होता है तब मनुष्य लालच, स्वार्थी गतिविधियों, महत्वाकांक्षा, बेचैनी और तीव्र इच्छा के प्रभाव में रहता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१४-१३॥
aprakāśo'pravṛttiśca pramādo moha eva ca | tamasyetāni jāyante vivṛddhe kurunandana || 14-13 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे कुरुनन्दन, जब तमोगुण प्रबल होता है, तब अज्ञान, आलस्य, मोह और मतिभ्रम प्रकट होते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४-१४॥
yadā sattve pravṛddhe tu pralayaṁ yāti dehabhṛt | tadottamavidāṁ lokānamalānpratipadyate || 14-14 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जब कोई देहबद्ध जीव सत्वगुण के प्रभाव में देह त्याग करता है, तो वह उच्च लोकों को प्राप्त करता है जहां महान मनीषि यां निवास करते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 15
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥१४-१५॥
rajasi pralayaṁ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate | tathā pralīnastamasi mūḍhayoniṣu jāyate || 14-15 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जब रजोगुण के प्रभाव में किसी की मृत्यु होती है, तब वह उन लोगों के बीच पुनर्जन्म लेता है जिन्हें सांसारिक कर्मों से लगाव होता है। यदि कोई तमोगुण के प्रभाव में मृत्यु प्राप्त करता है तब वह मूढ़ों के बीच पुनर्जन्म लेता है।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 15 के पश्चात चिंतन
उपर्युक्त पाँच श्लोकों में भौतिक प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रजो, तमो) के लक्षणों का और भी वर्णन किया गया है, तथा साथ ही मृत्यु के समय जीवित प्राणियों पर उनके प्रभाव को बताया गया है। जब किसी की मृत्यु सत्त्वगुण के प्रभाव में होती है तब वह ज्ञान से प्रकाशित होकर उन उच्च लोकों को प्राप्त करता है जहां महान मनीषि यां निवास करते हैं। जब किसी की मृत्यु रजोगुण के प्रभाव में होती है, जिस के लक्षण लालच, स्वार्थी गतिविधियां, महत्वाकांक्षा, बेचैनी और तीव्र इच्छाएं होती हैं, तब वह उन लोगों के बीच पुनर्जन्म लेता है जो सांसारिक गतिविधियों से लगाव रखते हैं। और जब मनुष्य में सबसे दुर्भाग्यशालियों की मृत्यु तमोगुण में होती है, जिस के लक्षण हैं, अज्ञानता, आलस्य, मोह और भ्रम, तब वे असभ्य लोगों के गर्भ में या इससे भी बदतर, कुत्ते, बिल्लियां या मूढ़ जानवर बनकर जन्म लेते ह।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 16
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१४-१६॥
karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam | rajasastu phalaṁ duḥkhamajñānaṁ tamasaḥ phalam || 14-16 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यह कहा गया है कि सात्त्विक कर्मों का फल निर्मलता है, राजसिक कर्मों का परिणाम दुःख है, और तामसिक कर्मों का परिणाम अज्ञान है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१४-१७॥
sattvātsañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva ca | pramādamohau tamaso bhavato'jñānameva ca || 14-17 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
सत्त्वगुण से ज्ञान की उत्पत्ति होती है, रजोगुण से लोभ, तथा तमोगुण से मोह, भ्रम एवं अज्ञानता की उत्पत्ति होती है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१४-१८॥
ūrdhvaṁ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ | jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥ || 14-18 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
सात्त्विक व्यक्ति उच्च लोकों को प्राप्त करते हैं, जो राजसिक हैं वे मध्य (पृथ्वी लोक) में रह जाते हैं, और जो तामसिक हैं उनकी जीवन के निम्न स्तर में अधोगति होती हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४-१९॥
nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣṭānupaśyati | guṇebhyaśca paraṁ vetti madbhāvaṁ so'dhigacchati || 14-19 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जब कोई यह समझ लेता है कि प्रकृति के गुणों को छोड़कर कोई अन्य सक्रिय कर्ता नहीं है, और इन गुणों के परे स्थित परम पुरुष को वह जानता है, तब वह मेरा स्वभाव प्राप्त कर लेता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 20
गुणानतान्तीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥१४-२०॥
guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān | janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto'mṛtamaśnute || 14-20 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जब व्यक्ति शरीर में प्रकट होने वाले इन तीनो गुणों से पार हो जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और अन्य दुखो से मुक्त हो जाता है। और फिर वह अमरत्व का रस पान करता है।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 20 के पश्चात चिंतन
प्रकृति के भौतिक गुणों के भ्रम और उसके प्रभाव से बचना या उस पर काबू पाना अत्यंत ही मुश्किल है, लेकिन यह तब संभव होता है जब कोई भगवद्गीता के ज्ञान की साधना करता है और स्वयं को भक्ति-योग की प्रक्रिया में निष्ठापूर्वक निमग्न करता है। भगवद्गीता के अध्ययन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान, व्यक्ति को प्रकृति के भौतिक गुणों को पार करने में सक्षम बनाता है, क्योंकि ऐसा ज्ञान अपने आप में ही पारलौकिक और सभी त्रुटियों (भ्रम), मोह (प्रमाद), छल (विप्रलिप्सा) तथा मिथ्या धारणा (करणपाटव) से मुक्त होता है। दूसरे शब्दों में, भगवद्गीता में निहित ज्ञान निष्कलंक एवं परिपूर्ण है। भगवान श्री कृष्ण यह वचन देते हैं की जो भी प्रकृति के भौतिक गुणों को पार करे, वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और व्याधियों से मुक्त हो जायेगा और वह अमरत्व का रस पान करेगा। ईशोपनिषद् में भी इसकी इस तरह से पुष्टि की गई है:
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥
जो अज्ञान (अविद्या) का पारगमन करता है और पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करता है वह निश्चित रूप से जन्म और मृत्यु के भवर से ऊपर उठ कर अमरत्व का रस-पान करता है। (ईशोपनिषद् ११)
ज्ञान की उन्नति का समकालीन विश्व दृष्टिकोण यह है कि प्रत्यक्ष प्रमाण, प्रयोग, परिकल्पना और अटकलों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया जाता है। ज्ञान प्राप्त करने की इस प्रक्रिया को आरोह-पन्थ कहा जाता है। हालांकि, ज्ञान की आरोही प्रक्रिया पूरी तरह से मन, बुद्धि और इद्रियों पर निर्भर करती है, और इस प्रकार यह चार भौतिक दोषों - त्रुटी, भ्रम, छल और मिथ्या धारणा के अधीन है। तदनुसार, कोई भी वैज्ञानिक ज्ञान परिपूर्ण नहीं है, और कभी हो भी नहीं सकता। वास्तव में, कई वैज्ञानिकों के स्वीकरण से, वे कभी भी ज्ञान के अंत को प्राप्त नहीं कर सकते। जितना वे सीखते हैं, उतना ही सीखने के लिए होता है, या जितना वे सीखते हैं, उतना ही अधिक उन्हें पता चलता है कि उनके पूर्ववर्ती वैज्ञानिक गलत थे। कुछ भी हो, वैज्ञानिक यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें पूर्ण ज्ञान नहीं है - और जब मृत्यु आती है तब वैज्ञानिकों की एक और पीढ़ी धूल में मिल जाती है।
श्री कृष्ण से जो ज्ञान गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से अवतरित हो रहा है अवरोह-पन्थ कहा जाता है और यह भौतिक दोषों से मुक्त होता है। भगवद्गीता का अर्थ है श्री कृष्ण के वचन - जिस का श्रवण मनुष्य को मृत्यु से पहले ही जीवन की पूर्णता प्राप्त करने के योग्य बनाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 21
अर्जुन उवाच ।
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥१४-२१॥
arjuna uvāca | kairliṅgaistrīnguṇānetānatīto bhavati prabho | kimācāraḥ kathaṁ caitāṁstrīnguṇānativartate || 14-21 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
अर्जुन ने पूछा - हे कृष्ण, जो इन त्रिगुणों से परे है उसे किन लक्षणों से पहचाना जा सकता है? उसका आचरण कैसा होता है और प्रकृति के इन त्रिगुणों को वह कैसे पार करता है?
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 22
श्रीभगवानुवाच ।
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥१४-२२॥
śrībhagavānuvāca | prakāśaṁ ca pravṛttiṁ ca mohameva ca pāṇḍava | na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati || 14-22 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया - हे पांडू-पुत्र जो प्रकाश, आसक्ति या भ्रम की उपस्थिति से न घृणा करता है और न ही उनके लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा रखता है —
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 23
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥१४-२३॥
udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate | guṇā vartanta ityevaṁ yo'vatiṣṭhati neṅgate || 14-23 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो उदासीन रहता है और प्रकृति के त्रिगुणों से प्रभावित या विचलित नहीं होता है —
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 24
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥१४-२४॥
samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṁstutiḥ || 14-24 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो सुख और दुःख दोनों में समान रहता है, स्वयं में ही संतुष्ट रहता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के बीच कोई स्वाभाविक अंतर नहीं देखता, जो दोनों अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों अबाधित रहता है, जो बुद्धिमान है, जिस के लिए अपमान और प्रशंसा समान है —
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥१४-२५॥
mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ | sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate || 14-25 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो यश और अपयश को एक समान रूप से देखता हैं, जो मित्र और क्षत्रु दोनों के प्रति निष्पक्ष है, और जो सांसारिक या भौतिक कार्यों का त्याग करता है - ऐसे व्यक्ति को भौतिक प्रकृति के गुणों से परे मानना चाहिए।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१४-२६॥
māṁ ca yo'vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate | sa guṇānsamatītyaitānbrahmabhūyāya kalpate || 14-26 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो भक्ति-योग में बिना विचलित हुए मेरी सेवा में लगे रहते हैं, वे भौतिक प्रकृति के इन त्रिगुणों को पार कर मोक्ष (ब्रह्म-तत्त्व) के योग्य हो जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥१४-२७॥
brahmaṇo hi pratiṣṭhāhamamṛtasyāvyayasya ca | śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca || 14-27 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मैं ही अमर, अविनाशी ब्रह्म-ज्योति का आधार हूँ, जो सनातन धर्म और परम आनंद का आधार है।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 27 के पश्चात चिंतन
जो व्यक्ति प्रकृति के गुणों से मुक्त है उसके लक्षणों का यहाँ वर्णन किया गया है। ऐसा व्यक्ति भौतिक संसार के द्वंद्वों में समान रहता है। ऐसा व्यक्ति सुख और दुःख से प्रभावित नहीं होता क्योंकि वह दोनों के अस्थायी स्वभाव को जानता है। मुक्त जीव अध्यात्म की साधना में संतुष्ट रहता है और धन से प्रेरित या गरीबी से परेशान या विचलित नहीं होता। वह सोना, धूल या एक साधारण पत्थर को एक समान देखता है (सम लोष्टाश्म काञ्चनः)। वह बुद्धिमान है, उसके लिए अपमान और प्रशंसा समान है, उसका कोई क्षत्रु नहीं है क्योंकि वह मित्र और क्षत्रु दोनों के लिए निष्पक्ष रहता है। ये उन लोगों की विशेषताएं हैं, जो भौतिक प्रकृति के त्रिगुणों से ऊपर स्थित होते हैं। श्रीमद्भागवतम् में इसकी पुष्टि इस प्रकार है -
सात्त्विकः कारकोऽसङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः ।
तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः ॥
जो आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करता है, वह सत्त्वगुण में होता है। जो स्वार्थ के लिए कर्म करता है, वह रजोगुण में होता है। जो उचित और अनुचित में भेद भाव किए बिना कर्म करता है वह तमोगुण में होता है। किंतु जो श्रीकृष्ण का आश्रय लेता है, वह भौतिक प्रकृति के गुणों से परे होता है। (श्रीमद्भागवतम् ११.२५.२६)
मुक्त पुरुष सदैव बिना विचलित हुए भक्ति-योग में स्थित होते हैं क्योंकि वे कृष्ण को अमर, अविनाशी ब्रह्मन, भगवद्गीता के माध्यम से अनंत ज्ञान के दाता, एवं परमानंद के मूल स्रोत के रूप में जानते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 14 • श्लोक क्रमांक 28
ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां
वैयासिक्यां भीष्मपर्वाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥
oṁ tatsaditi śrīmahābhārate śatasāhasryāṁ saṁhitāyāṁ vaiyāsikyāṁ bhīṣmaparvāṇi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṁ yogaśāstre śrīkṛṣṇārjunasaṁvāde guṇatrayavibhāgayogo nāma caturdaśo'dhyāyaḥ ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
ॐ तत् सत् – अतः व्यास विरचित शतसहस्र श्लोकों की श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में पाए जाने वाले आध्यात्मिक ज्ञान का योग-शास्त्र - श्रीमद् भगवद् गीतोपनिषद् में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से लिए गए गुणत्रय विभाग योग नामक चौदहवें अध्याय की यहां पर समाप्ती होती है।