श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 1
श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायतप आर्जवम् ॥१६-१॥
śrībhagavānuvāca | abhayaṁ sattvasaṁśuddhirjñānayogavyavasthitiḥ | dānaṁ damaśca yajñaśca svādhyāyatapa ārjavam || 16-1 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
भगवान श्री कृष्ण ने कहा - हे भारत, ये दिव्य प्रकृति से युक्त जन्म लेने वाले लोगों (देव) के विभिन्न गुण हैं - निर्भयता, हृदय की निर्मलता, आध्यात्मिक ज्ञान में तन्मयता, दान, आत्म-नियंत्रण, बलिदान, वेद अध्ययन, तपस्या, निष्कपटता अहिंसा, सत्यनिष्ठा, क्रोध से मुक्ति, त्याग, शांति, दूसरों में दोष ढूंढने से विमुखता, सभी प्राणियों के लिए करुणा, धनलोलुपता का अभाव, सौम्यता, विनय, स्थिरता, पराक्रम, क्षमा, धैर्य, स्वच्छता, ईर्ष्या और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्ति।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 2
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥१६-२॥
ahiṁsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam | दया bhūteṣvaloluptvaṁ mārdavaṁ hrīracāpalam || 16-2 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, अपैशुन, दया, अलोलुप्त्व, मार्दव, ह्री और अचपल।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 3
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥१६-३॥
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā | bhavanti sampadaṁ daivīmabhijātasya bhārata || 16-3 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और अतिमानिता - ये सभी दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 3 के पश्चात चिंतन
इस अध्याय में श्री कृष्ण अर्जुन से मनुष्यों की दो सामान्य श्रेणियों, देवों और असुरों, या धार्मिक और अधार्मिक का वर्णन करते हैं। यहाँ तक, गीता के दौरान, कृष्ण ने देवों के कई गुणों और उनकी विशेषताओं को बताया है। ये वे गुण हैं जिन्हें हम एक ‘अच्छे इंसान’ में देखते हैं और ये गुण आत्म-साक्षात्कार के लिए भी अनुकूल हैं। इस अध्याय के श्लोक १ से ३ में इनका वर्णन किया गया है।
अब कृष्ण विस्तारपूर्वक असुरों के गुणों का वर्णन करते हैं, जिससे अर्जुन यह निर्णय ले सके कि वह किस मार्ग पर चले और कैसी संगत को चुने। अंततः धार्मिक और अधार्मिक के बीच भेद करने में सक्षम होकर, अर्जुन अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर पाएगा जो कुरुक्षेत्र में उसके सामने खड़े हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 4
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं च अभिजातस्य पार्थ सम्पदम आसुरीम् ॥१६-४॥
dambho darpo'bhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca | ajñānaṁ cābhijātasya pārtha sampadam āsurīm || 16-4 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
दंभ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, क्रूरता और अज्ञान - ये उनके गुण है जो आसुरी प्रकृति में जन्म लेते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 5
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदम दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥१६-५॥
daivī sampadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā | mā śucaḥ sampadaṁ daivīmabhijāto'si pāṇḍava || 16-5 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
दैवी-गुण मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है, जबकि आसुरी-गुण कर्मों के बंधन का कारण बनता है। लेकिन तुम निश्चिंत रहो हे पाण्डव, क्योंकि तुम्हारा जन्म दैवी-गुण में हुआ है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 6
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्तो आसुरं पार्थ मे शृणु ॥१६-६॥
dvau bhūtasargau loke'smindaiva āsura eva ca | daivo vistaraśaḥ prokto āsuraṁ pārtha me śṛṇu || 16-6 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे पार्थ, दो तरह के लोग इस संसार में जन्म लेते हैं - देव और असुर। मैंने तुम्हें देवों के बारे में विस्तृत रूप से बताया है। अब तुम मुझसे असुरों का वर्णन सुनो।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 6 के पश्चात चिंतन
उचित और अनुचित कार्यों के बीच भेद करने में असमर्थता एक असुर का पहला स्पष्ट दिखाई देनेवाला लक्षण है। इसके अतिरिक्त, श्री कृष्ण कहते हैं कि असुर प्रकृति के लोग यह नहीं जानते कि पवित्रता, उचित व्यवहार या सत्यता क्या है। सत्यता, स्वच्छता, तपस्या और दया मनुष्य में सर्वाधिक वांछनीय गुण हैं, लेकिन जो असुर स्वभाव के होते हैं उनमें इन गुणों का पूर्ण अभाव होता है।
श्री कृष्ण आसुरी मानसिकता के लोगों के गुणों और वैशिष्ट्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन जारी रखते हैं, और कृष्ण जो कह रहे हैं उस पर यदि ध्यान दिया जाए, तो हमें इस कड़वे सत्य को मानना पड़ेगा कि आज जिस दुनिया में हम रहते हैं वह असुरों की प्रवृत्ति और गतिविधियों से भरी पड़ी है।
आज, हमारी दुनिया की सरंचना बड़े पैमाने पर उपभोक्ता वाद पर आधारित है, “जब तक थक कर चूर नहीं होते, खरीदारी करते रहिये” की मानसिकता (“Shop till you drop” mentality)। भोग, भोग, और बस भोग!
“यदि अच्छा लगता है तो जरुर करो” वाली मानसिकता (“If it feels good, do it’ mentality) हर जगह है। हमें यह मानने के लिए बाध्य किया जाता है कि परम-सत्य नाम की कोई चीज ही नहीं है, बस यही एक जीवन है और इसलिए जबतक जीवित हैं हमें इसका भरपूर आनंद लेना चाहिए - पुरुषों और महिलाओं की यौन वासना की पूर्ती ऐसे आनंद में सबसे आगे है। प्रतीक के तौर पर, दुनिया भर में, गर्भनिरोधक और गर्भपात की अनौपचारिक और कानूनी स्वीकृति ही इस बात को स्पष्ट दर्शाती है।
आज के मनुष्य की मानसिकता को देखकर ऐसा लगता है कि दुनिया सर्व नाश के पथ पर जा रही है - पर्यावरण के उजाड़ने से, अर्थव्यवस्था के ढह जाने से, कई जन्तु जातियों के विलुप्त हो जाने से, और तो और कुछ मानव जातियों के भी विलुप्त हो जाने से, यही महसूस होता है। क्या हम देख नहीं पा रहे कि क्या हो रहा है? क्या मानव जाती अपनी उपलब्धियों से इतना घमंडी और हठी हो गया है कि वह अन्धा हो गया है?
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥१६-७॥
pravṛttiṁ ca nivṛttiṁ ca janā na vidurāsurāḥ | na śaucaṁ nāpi cācāro na satyaṁ teṣu vidyate || 16-7 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो लोग असुर स्वभाव के होते हैं वे इस बात का भेद नहीं कर पाते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उनमें कोई शुद्धता, उचित व्यवहार या सच्चाई पाई नहीं जाती।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥१६-८॥
asatyamapratiṣṭhaṁ te jagadāhurīśvaram | aparasparasambhūtaṁ kimanyatkāmahaitukam || 16-8 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
वे दावा करते हैं कि यह संसार मिथ्या है, निराधार है और बिना किसी दैत्व के है। उनका मानना है कि स्त्री और पुरुष के बीच का संबंध ही सबका स्रोत है, और यह की काम-वासना के अतिरिक्त जीवन का अन्य कोई उद्देश्य नहीं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 9
एतां दृष्टिमुष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिहिताः ॥१६-९॥
etāṁ dṛṣṭimavaṣṭabhya naṣṭātmāno'lpabuddhayaḥ | prabhavantyugrakarmāṇaḥ kṣayāya jagato'hitāḥ || 16-9 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
इस दृष्टि कोण के अनुसार, ऐसे लोग, जो भ्रष्ट एवं अल्पबुद्धि होते हैं, वे दुनिया के विनाश के लिए द्रोही गतिविधियों में संपन्न और संलग्न होते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वाअसद्ब्रह्मान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१६-१०॥
kāmamāśritya duṣpūraṁ dambhamānamadānvitāḥ | mohādgṛhītvāasadbrahmānpravartante'śucivratāḥ || 16-10 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
अपनी अतोषणीय काम वासनाओं से आसक्त एवं दम्भ व घमंड में डूबे, ऐसे लोग मोह के कारण कपटपूर्ण वैचारिकी अपनाते हैं, और अशुद्ध कृत्यों की प्रतिज्ञा लेते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयं च उपस्थिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥१६-११॥
cintāmaparimeyāṁ ca pralayaṁ ca upasthitāḥ | kāmopabhogaparamā etāvaditi niścitāḥ || 16-11 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
इस विश्वास के साथ की अपनी लालसा और अपनी काम-वासनाओं को पूरा करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है, वे मृत्यु के समय तक अनगिनत व्यग्रताओं से गुज़रते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 12
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१६-१२॥
āśāpāśaśatairbaddhāḥ kāmakrodhaparāyaṇāḥ | īhante kāmabhogārthamanyāyenārthasañcayān || 16-12 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
सैकड़ों महत्वाकांक्षाओं से बंधे, काम और क्रोध में लीन, वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी अनुचित तरीके से धन इकट्ठा करने के प्रयास में लगे रहते हैं।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 12 के पश्चात चिंतन
सभ्य दुनिया में एक अच्छी सरकार का होना जरूरी है। ऐसी सरकार का उद्देश्य समाज को खतरे से बचाने का है - न केवल एक हमलावर सेना के खतरे से, बल्कि उन अनैतिक विचारधाराओं के खतरे से भी जो एक सभ्यता को भीतर से नष्ट कर सकती हैं। दुर्भाग्य से, ऐसा लगता है जैसेकी दुनिया भर में सरकारों ने उचित व्यवहार के सभी लक्षणों को छोड़ दिया है और वे खुद ही लोगों को लूटने में प्रमुख हो गए हैं। किसी भी तरह से धन इकट्ठा करना और लोगों को जीवन की सबसे बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित करना, ऐसे निरंकुश शासकों को कोई शर्म नहीं आती। सचमुच ही, दुनिया असुर मानसिकता वाले लोगों के हाथों में घोर अंधकार की अवधि में है।
अपने उच्च मंचों से राज्य के प्रमुख घोषणा करते हैं, “हमें अपने दुश्मनों को मार गिराना चाहिए। दुष्टों को निश्चित ही सबक सिखाना चाहिए। हम विजयी होंगे, हम दुनिया पर राज करेंगे, हम सुख का भोग करेंगे, हम चुने हुए लोग हैं, हम शक्तिशाली हैं, हम खुशहाल हैं और कोई भी हमारे जैसा नहीं हैं।” जबकि जनता का उन्माद उदंड रूप से बढ़ता है, निर्दोषों को मौत के घाट उतारा जाता है, और पृथ्वी अपने बच्चों के लिए रोती है। फिर भी ऐसा लगता है कि हम चिन्ताहीन हैं। कृष्ण कहते हैं कि, ऐसा है हमारा अज्ञान।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 13
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदम्पी मे भविष्यति पुनರ್ಧनम ॥१६-१३॥
idamadya mayā labdhamimaṁ prāpsye manoratham | idamastīdamppī me bhaviṣyati punardhanam || 16-13 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
वे कहते हैं: “मैंने आज यह हासिल किया है, अब मैं अपनी अन्य इच्छाएं पूरी करूँगा। यह धन मेरा है और भविष्य में यह बढ़ेगा।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१६-१४॥
asau mayā hataḥ śatrurhaniṣye cāparānapi | īśvaro'hamahaṁ bhogī siddho'haṁ balavānsukhī || 16-14 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
इस शत्रु का मैंने वध किया है और भविष्य में मैं दूसरों को भी मार दूँगा। मेरा ही राज है! मैं ही भोगी हूँ! मैं सिद्ध हूँ! मैं शक्तिशाली हूँ! मैं सुखी हूँ!
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 15
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्यस्तसदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१६-१५॥
āḍhyo'bhijanavānasmi ko'nyastasadṛśo mayā | yakṣye dāsyāmi modiṣye ityajñānavimohitāḥ || 16-15 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मैं धनी और कुलीन हूँ। क्या मेरे बराबर कोई है? मैं यज्ञ करूंगा, दान दूंगा और भोग करूँगा! इस प्रकार वे अज्ञान से बहक जाते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 16
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६-१६॥
anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ | prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake'śucau || 16-16 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
असुरों के दिमाग विभिन्न भ्रामक विचारों से भरे होते हैं और इस तरह वे मोह जाल में फंसे हुए होते हैं। जैसे वे अपनी सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए कार्यरत होते जाते हैं, वैसे ही उनका घोर नरक में पतन होता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 17
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१६-१७॥
ātmasaṁbhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ | yajante nāmayajñaiste dambhenāvidhipūrvakam || 16-17 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
आत्म-महत्व से भरपूर, जिद्दी और अपने धन के नशे में धुत, वे केवल नाम-मात्र के लिए उचित विधि का पालन किए बिना ही अभिमान से यज्ञों को करते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१६-१८॥
ahaṅkāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ ca saṁśritāḥ | māmātmaparadeheṣu pradviṣanto'bhyasūyakāḥ || 16-18 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
पूरी तरह से अहंकार, बल, अभिमान, काम और क्रोध के वश में होकर, ऐसे लोग मुझसे घृणा करते हैं, हालांकि मैं उनके और दूसरों के भी शरीर में वास करता हूँ।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 19
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमुशुभान आसुरीष्वेव योनिषु ॥१६-१९॥
tānahaṁ dviṣataḥ krūrānsaṁsāreṣu narādhamān | kṣipāmyajasramuśubhān āsurīṣveva yoniṣu || 16-19 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
ऐसे ईर्ष्यालु और क्रूर व्यक्ति सदा ही उन दुराचारी और अधर्मियों के बीच निरंतर जन्म लेते हैं, जहां वे जन्म और मृत्यु के चक्र में बार-बार दुख झेलते हैं, क्योंकि वे मनुष्यों में सबसे अधम हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 20
आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यानत्यधमां गतिम् ॥१६-२०॥
āsurī yonimāpannā mūḍhā janmani janmani | māmaprāpyaiva kaunteya tato yānatyadhamāṁ gatim || 16-20 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे कौन्तेय, सदैव असुरों के बीच जन्म लेने वाले ऐसे मूर्ख मुझे कभी प्राप्त नहीं करते। बल्कि, वे सबसे घृणित अवस्था में गिर जाते हैं।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 20 के पश्चात चिंतन
अंततः जब कोई व्यक्ति असुरों के पथ का अनुसरण करता है, तब ना तो उसे सुख, सफलता या ख़ुशहाली मिलती है, ना ही उसे आत्म-साक्षात्कार के पथ पर प्रगति प्राप्त होती है। तो फिर क्या करना चाहिए?
भगवान श्री कृष्ण ने श्लोक २१ में आसुरी मानसिकता की तीन मुख्य लक्षणों की पहचान, काम (वासना), क्रोध और लोभ (लालच) के रूप में की है। निश्चित ही ये वृत्तियां जीवों में अत्यंत दुर्भाग्य का कारण बनते हैं, और इस तरह ये आत्म-साक्षात्कार के विध्वंसकर्ता हैं। इसलिए, वासना, क्रोध और लालच पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, यदि व्यक्ति अपने मानव जीवन को सार्थक बनाना चाहता हो। वासना, क्रोध और लालच जैसे महान शत्रुओं पर विजय पाने के लिए, इन्द्रियों को नियंत्रित करने में स्वयं को पूरी तरह से कर्मठतापूर्वक लागू करना चाहिए और भक्ति-योग में निर्धारित कार्यों को करना चाहिए, जिसे साधना कहा जाता है। साधना का अभ्यास गुरु से सीखा जाता है, जो एक तत्त्वदर्शी हैं, जिन्होंने सत्य को देखा है, और गुरु अपने छात्र को उसकी क्षमता और आध्यात्मिक उन्नति के वर्तमान चरण के अनुसार निर्देश देते हैं।
इसके लिए, गुरु भक्ति-योग सभी छात्रों को महा-मंत्र का जाप करने और श्री कृष्ण पर मन को केन्द्रित करने की सलाह देते हैं। यह प्रक्रिया सभी के लिए शुद्ध और लाभकारी है, चाहे व्यक्ति नौसिखिया हो या बहुत उन्नत हो। हर किसी को वासना, क्रोध और लालच के दुश्मनों को परास्त करने के लिए महा-मंत्र जप में संलग्न होना चाहिए, और कलियुग के अज्ञान और अंधकार को दूर करना चाहिए।
नामसंकीर्तनं यस्य सर्व पाप प्रणाशनम् ।
प्रणामो दुः ख शमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥
महामन्त्र का जाप हमें सारे अवांछनीय आदतों से, सभी अवांछनीय गुणों से, एवं सभी दुःखों से मुक्त कर सकता है। महामन्त्र का जाप करें! कुछ और आवश्यक नहीं है। महामन्त्र का जाप करें और इस सबसे व्यापक एवं विस्तृत आस्तिक अवधारणा के साथ इस अंधकारमय कलियुग में अपने सच्चे जीवन की शुरुआत करें। चलि ए हम सभी श्री कृष्ण को नमन करें। (श्रीमद्भागवतम् १२.१३.२३)
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 21
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥१६-२१॥
trividhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśanamātmanaḥ | kāmaḥ krodhastathā lobhastasmādetattrayaṁ tyajet || 16-21 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
निम्न लोकों (नरक) और आत्म-विनाश की ओर जाने के लिए तीन मार्ग हैं - काम, क्रोध और लालच। इसलिए, इन तीनों को छोड़ देना चाहिए क्योंकि वे आत्म-साक्षात्कार के महान विध्वंसक हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 22
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यत्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥१६-२२॥
etairvimuktaḥ kaunteya tamodvāraistribhirnaraḥ | ācaratyatmanaḥ śreyastato yāti parāṁ gatim || 16-22 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे कुन्ती पुत्र, जो अंधकार के इन तीनों मार्गों से मुक्त है, वह अपने सर्वोत्तम हित के अनुकूल ही अपना आचरण करता है। वह क्रमश: परम धाम में पहुंच जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 23
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥१६-२३॥
yaḥ śāstravidhimutsṛjya vartate kāmakārataḥ | na sa siddhimavāpnoti na sukhaṁ na parāṁ gatim || 16-23 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो व्यक्ति अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए वेदों के नियमों की उपेक्षा करता है, वह कभी भी सिद्धि, सुख या परम धाम प्राप्त नहीं करता।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥१६-२४॥
tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau | jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartumihārhasi || 16-24 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
वैदिक निषेधाज्ञाएं तुम्हारी विश्वस्त प्रमाण हैं, यह जानने के लिए कि क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं। इसलिए, इनके माध्यम से संसार में अपने कर्तव्यों को समझकर तुम्हें उनके अनुसार ही कार्य करना चाहिए।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 24 के पश्चात चिंतन
अंततः जब कोई व्यक्ति असुरों के पथ का अनुसरण करता है, तब ना तो उसे सुख, सफलता या ख़ुशहाली मिलती है, ना ही उसे आत्म-साक्षात्कार के पथ पर प्रगति प्राप्त होती है। तो फिर क्या करना चाहिए?
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 16 • श्लोक क्रमांक 25
ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां
वैयासिक्यां भीष्मपर्वाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥
oṁ tatsaditi śrīmahābhārate śatasāhasryāṁ saṁhitāyāṁ vaiyāsikyāṁ bhīṣmaparvāṇi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṁ yogaśāstre śrīkṛṣṇārjunasaṁvāde daivāsurasampadvibhāgayogo nāma ṣoḍaśo'dhyāyaḥ ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
ॐ तत् सत् - अतः व्यास विरचित शतसहस्र श्लोकों की श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में पाए जाने वाले आध्यात्मिक ज्ञान का योग-शास्त्र - श्रीमद् भगवद् गीतोपनिषद् में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से लिए गए दैवासुरसम्पद् विभाग योग नामक सोलहवें अध्याय की यहां पर समाप्ती होती है।