भक्ति की सभा
ॐ
श्रीमद्भागवत महापुराण
PURAN महर्षि वेदव्यास प्रणीत

श्रीमद्भागवत महापुराण

भगवान श्रीकृष्ण की बाल व रास लीलाओं और नवधा भक्ति का सर्वोच्च महाग्रंथ।

अनुवाद भाषा:
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 1

सञ्जय उवाच ।
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥२-१॥

sañjaya uvāca | taṁ tathā kṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam | viṣīdantamidaṁ vākyamuvāca madhusūdanaḥ || 2-1 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

संजय ने कहा - तब श्री कृष्ण ने अर्जुन से ये शब्द कहे, जब उसका हृदय करुणामय एवं उसकी आँखों में आंसु भरे हुए थे।

1225
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 2

श्रीभगवानुवाच ।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२-२॥

śrībhagavānuvāca | kutastvā kaśmalamidaṁ viṣame samupasthitam | anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna || 2-2 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

भगवान् श्री कृष्ण ने कहा - अर्जुन, इस संकटपूर्ण घड़ी में तुम्हे इस भ्रांति ने कैसे जकड़ लिया है? एक आर्य के लिए यह उचित नहीं, और ना यह उसे स्वर्ग की ओर ले जाता है। बल्कि, यह अपयश का कारण बन सकता है।

1268
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥२-३॥

klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate | kṣudraṁ hṛdayadaurbalyaṁ tyaktvottiṣṭha parantapa || 2-3 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे पार्थ, ऐसी नामर्दी छोड़ो। तुम्हे यह शोभा नहीं देती। हे परन्तप (शत्रुओं को दण्ड देनेवाला), उठो और इस प्रकार के दुर्बल हृदय के वश में मत आओ।

1311
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 4

अर्जुन उवाच ।
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥२-४॥

arjuna uvāca | kathaṁ bhīṣmamahaṁ saṅkhye droṇaṁ ca madhusūdana | iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana || 2-4 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अर्जुन ने उत्तर में कहा - हे मधुसूदन, युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे बुजुर्गों पर मैं कैसे अपने बाणों की वर्षा कर सकता हूँ, जब वे मेरे सम्मान के पात्र हैं?

1354
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 5

गुरून्हत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥२-५॥

gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṁ bhaikṣyamapīha loke | hatvārthakāmāṁstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogānrudhirapradigdhān || 2-5 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अपने सम्माननीय अग्रजों का वध करने से तो बेहतर है कि मैं इस संसार में भीख माँगकर अपना जीवन यापन करूं। अन्यथा, जिस धन-संपत्ति का हम यहां उपभोग करेंगे वह उनकी लहू से लथ-पथ होगी।

1397
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥२-६॥

na caitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ | yāneva hatvā na jijīviṣāmaste'vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ || 2-6 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मै नहीं जानता कि क्या हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है - उनपर विजय प्राप्त करना, या उनसे पराजित हो जाना। यहां, हमारे समक्ष एकत्रित धृतराष्ट्र के पुत्रों का यदी हम वध करते हैं तो मुझमें जीवित रहने की कोई अभिलाषा नहीं रहेगी।

1440
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 7

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥२-७॥

kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṁ dharmasammūḍhacetāḥ | yacchreyaḥ syānniścitaṁ brūhi tanme śiṣyaste'haṁ śādhi māṁ tvāṁ prapannam || 2-7 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मेरी स्वाभाविक क्षत्रीयता कमजोर हो रही है और भ्रम के कारण मैं धर्म के मार्ग को पहचान नहीं पा रहा हूँ। कृपया यह बताएं कि मेरे लिए सबसे हितकारी कार्य क्या है। अब स्वयं को आपके शिष्य के रूप में समर्पित करता हूँ। कृपया मुझे उपदेश प्रदान करें।

1483
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 8

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥२-८॥

na hi prapaśyāmi mamāpanudyādyacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām | avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṁ rājyaṁ surāṇāmapi cādhipatyam || 2-8 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

यदि मैं एक अप्रतिम संपन्न सामराज्य और देवों जैसी शक्ति भी प्राप्त कर लूँ फिर भी इन चीजों में मैं ऐसा कुछ नहीं देख रहा जो मेरे इन्द्रियों को क्षय कर रहे इस शोक को मिटा सके।

1526
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 8 के पश्चात चिंतन
यहां, द्वितीय अध्याय से ही भगवद्गीता वस्तुतः प्रारंभ होती है। भगवद्गीता का यथाशब्द अर्थ है भगवान् का गीत' और भगवान् का अर्थ है परम सत्य। भगवद्गीता में यहां पर पहली बार श्री कृष्ण को भगवान् कहकर संबोधित किया जाता है। पराशर मुनि जैसे वैदिक विद्वानों के अनुसार भगवान् वे हैं जो संपूर्ण ऐश्वर्य, वीर्य, यश, सौंदर्य, ज्ञान, व वैराग्य के स्वामी हैं। ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङ्गणः ॥ भगवान् वे हैं जिनमें ऐश्वर्य, वीर्य, यश, सौंदर्य, ज्ञान, व वैराग्य के लक्षण संपूर्णता में पाए जाते हैं। (विष्णु पुराण ६.५.४७) इसके अलावा, सोलहवें शताब्दी के वैष्णव तत्त्वज्ञ जीव गोस्वामी कहते हैं कि भगवान् हैं भजनीय गुण च अनन्त च नित्यः' - वे जो सर्व-पूजनीय गुणों के स्वामी हैं, और जिनका सर्वाकर्षणी स्वभाव ऐसा है कि वे हमारा स्नेह व श्रद्धाभाव अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आधुनिक समाज में भगवान् के अस्तित्व में होने न होने के विषय पर बहुत चर्चा होती है। भगवान् का अस्तित्व निश्चित करने से पहले यह परिभाषित करना आवश्यक है कि 'भगवान्' शब्द का अर्थ क्या है। तदनुसार, प्राचीन भारत के सत्यान्वेषी ऋषियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि भगवान् वास्तव में हैं तो वे समस्त संसार के स्वामी व अधिकारी होंगे, सर्वशक्तिमान होंगे, सबसे प्रसिद्ध होंगे, सबसे सुंदर होंगे, सर्वज्ञ होंगे, और साथ-साथ वे अनासक्त या त्यागी भी होंगे। सूक्ष्म विश्लेषण के पश्चात उन सत्यान्वेषी ऋषियों ने निश्चित किया है कि केवल श्री कृष्ण ही वस्तुता के परम स्त्रोत या परम सत्य हो सकते हैं, और दरसल वे ही हैं। इस विष्कर्ष परिणाम की अनेक संतों ने युगो-युगो से (१०,००० बीसी पूर्व से) पुष्टि की है और वैदिक शास्त्रों में, जैसे कि उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत, वेदान्त सूत्र, श्रीमद्भागवतम् और ब्रह्म-संहिता आदि शास्त्रों में इसकी व्यापक रूप से व्याख्या की गई है। ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः । अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व कारण कारणम् ॥ कृष्ण परमेश्वर हैं। उनका रूप सत् चित् एवं आनन्द से बना है। वे समस्त अस्तित्व के स्त्रोत हैं। वे गौ और इन्द्रियों के स्वामी हैं। उनका कोई अन्य स्रोत नहीं है और वे स्वयं ही सभी कारणों के मूल कारण हैं। (ब्रह्म-संहिता ५.१) एते चांश कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । इन्द्रारि व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥ भगवान् के विभिन्न अवतार या तो उनकी पूर्णविभूति के अंश हैं या उनकी पूर्णविभूति के अंशों के अंग हैं। परन्तु कृष्ण इन सभी अवतारों के मूलस्रोत हैं। जब अमंगलकारी शक्तियां भगवान् के भक्तों को व्याकुल करती हैं तब वे उनकी रक्षा हेतु प्रत्येक युग में प्रकट होते हैं। (श्रीमद्भागवतम् १.३.२८) हरिरेव सदाराध्यम् सर्वदेवेश्वरेश्वरम् । इतरे ब्रह्म-रुद्राद्य नवजेयम् कदाचन ॥ संपूर्ण जगत के स्वामी के रूप में केवल श्री हरि (कृष्ण) ही आराध्य हैं। ब्रह्म, शिव और अन्य सभी देवी-देवताएं कभी भी इस नियम का उल्लंघन नहीं करते। (पद्म-पुराण) यत्रावतीर्ण कृष्णाख्यम् परब्रह्मानराकृतिम् । जब परम पुरुष अपने मनुष्य सदृश रूप में अवतीर्ण होते हैं, वे परब्रह्म कृष्ण हैं। (विष्णु पुराण ४.११.२) तस्मात् कृष्ण एव परो देवस्तं ध्यायेत् तं रसेत् तं भजेत् तं यजेत् । अतः कृष्ण ही परम पुरुष हैं। उनका ध्यान करें। उनका ही आनंद लें। उनकी आराधना करें व उन के लिए भोग चढ़ाएं। (गोपाल-तापनी उपनिषद् १.५४) कृषि वाचकः शब्दो णश्च निर्वृति वाचकः । तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिदीयते ॥ 'कृष' शब्दांश कृष्ण के सर्वाकर्षी लक्षण को सूचित करता है और 'ण' उनके दिव्य आनंद को। जब 'कृष' शब्दांश को 'ण' से जोड़ा जाता है, तब 'कृष्ण' शब्द बनता है जो परम सत्य को सूचित करता है। रणभूमि में कुछ ही समय में वीरगती प्राप्त करने वालों के प्रति अर्जुन करुणामय हो गए हैं। वस्तुतः उनका दुःख इतना ज्यादा है कि वे अपने शत्रुओं का वध करने के बजाय स्वयं अपने प्राण देने के लिए तैयार हैं। किंतु अर्जुन एक कुलीन क्षत्रीय है और इसी कारण कृष्ण उन्हें अपने हृदय की दुर्बलता को त्याग करने की सलाह देते हैं। यदि कोई क्षत्रीय है तो शत्रु का सामना करना उसका कर्तव्य है ना की पीछे हटकर दुबक जाना। युद्ध करना अवश्य एक दुःखदायक परिस्थिति है, किंतु जब धर्म का अनुसरण करना होता है तब युद्ध अनिवार्य हो जाता है। प्राचीन काल में आक्रामकता घृणाजनक थी और समाज में एवं देशों के बीच वह बिलकुल ही वर्जित हुआ करता था। किंतु जब अतिक्रमण होता तब प्रतिकार या युद्ध स्वीकार्य था। महर्षी वसिष्ठ के अनुसार छः प्रकार के अतिक्रामक होते हैं और मनु-संहित के अनुसार इनका सामना एक घातक प्रतिकार से होना चाहिए। अग्निदो गरड़श्चैव शस्त्र-पाणिर्धनापहः । क्षेत्र-दारापहारी च षडेते ह्याततायिनः ॥ घर में आग लगानेवाला, विष घोलनेवाला, घातक शस्त्रों से हमला करनेवाला, राज्य की संपत्ति हड़पनेवाला, आक्रमण कर राज्य पर कब्जा करनेवाला, और परिवार के सदस्यों का अपहरण करनेवाला - इन सभी को आक्रमणकारी समझा जा सकता है। (वसिष्ठ-स्मृति ३.१९) आततायिनमायान्तम् हन्यादेवाविचारयन् । नाततायिवधेदोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥ बिना हिचकिचाहट के एक क्षत्रीय को अतिक्रामकों का वध करना चाहिए, क्योंकि उनकी हत्या से पाप नहीं होता है। (मनु-संहित ८.३५०) ये सभी श्लोक सामाजिक सिद्धांत (अर्थ-शास्त्र) में दिए गए नियमों के अनुसार हैं। तथापि, धार्मिक सिद्धांत (धर्म-शास्त्र), जिसे अर्थ-शास्त्र से ऊँचा माना जाता है, वह कहता है कि कभी किसी प्राणी को क्षति नहीं पहुंचाना चाहिए (मा हिंसयत् सर्वभूतानि) - तो फिर परिवार के सदस्यों या बुजुर्गों का क्या कहना? । अर्जुन की यही दुविधा थी। कृष्ण का कोमल-हृदयी भक्त होने के कारण, अर्जुन अपने परिजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने से विमुख हो गए थे, किंतु एक क्षत्रिय होने के कारण वे नियति का सामना करने के लिए मजबूर भी थे। इस दुविधा की दशा में अर्जुन ने कृष्ण से अपने सखा होने के नैमित्तिक संबंध को टाल कर उन्हें अपना गुरु मान लिया। वैदिक ज्ञान के अनुसार, अनगिनत ग्रहो एवं समांतर ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है जहां पर जीवन पाया जा सकता है। इनमें से कुछ ग्रहों व ब्रह्माण्डों में जीवनस्तर, पृथ्वी पर हमारे जीवनस्तर से उच्च हैं, तो कुछ में पृथ्वी से निम्न। यदि कोई अपने जीवनकाल में अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करता है तो तदनुसार वह उच्च लोकों में जन्म की ओर प्रस्थान करता है। लेकिन यदि वह अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तो अगले जन्म में केवल कलंक एवं निचले लोकों में निम्नगमन उसकी प्रतीक्षा करते हैं। अर्जुन के द्वारा अपने निर्धारित वैदिक कर्तव्यों का नहीं पालन करने के कारण कृष्ण 'अनार्य' शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अर्थ है आर्य नहीं होना। आर्यन कौन हैं और वे कहाँ से आए हैं, इस बात पर सदियों से बहस चलती आ रही है। इस तरह की अधिकांश विवेचनाएं शारीरिक उपाधियों पर निर्धारित होती हैं और एक जाति के लोगों को दूसरे से श्रेष्ठतर सिद्ध करने के लिए की जाती हैं। परन्तु भगवद्गीता में, श्री कृष्ण के वचनानुसार, आर्यन वे हैं जो वैदिक निर्देशों के अनुसार अपने धर्मों का पालन करते हैं। अतएव यह समझा जा सकता है कि आर्यन शब्द कोई विशेष जाति के लोगों से नहीं बल्कि एक जीवन जीने की कला से, एक जीवनशैली से संबंधित है। परमात्मा और आत्मा के सनातन अस्तित्व का ज्ञान ही समस्त वैदिक प्रज्ञता की कुंजी है। इस अध्याय में, अर्जुन के लिए कृष्ण के उपदेशों का यही केंद्रीय विषय है।
1569
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 9

सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥२-९॥

sañjaya uvāca | evamuktvā hṛṣīkeśaṁ guḍākeśaḥ parantapa | na yotsya iti govindamuktvā tūṣṇīṁ babhūva ha || 2-9 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

संजय ने कहा - श्री कृष्ण से इस प्रकार कहकर, सजग, शत्रु-विजयी अर्जुन ने घोषित किया, "हे कृष्ण, हे गोविन्द, मैं युद्ध नहीं करूंगा!", और फिर मौन हो गए।

1612
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 10

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥२-१०॥

tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata | senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṁ vacaḥ || 2-10 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे भरत वंशज, वहां उन दोनों सेनाओं के मध्य, श्री कृष्ण (हृषीकेश) मुस्कराते हुए शोक में डूबे अर्जुन से इस प्रकार बोले।

1655
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 11

श्रीभगवानुवाच ।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२-११॥

śrībhagavānuvāca | aśocyānanvaśocastvaṁ prajñāvādāṁśca bhāṣase | gatāsūnagatāsūṁśca nānuśocanti paṇḍitāḥ || 2-11 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

भगवान् श्री कृष्ण ने कहा- तुम एक बुद्धिमान की तरह बात कर रहे हो, परन्तु तुम उस बात पर शोक कर रहे हो जिस पर शोक करना बेकार है। बुद्धिमान ना तो जीवित व्यक्तियों पर न मृतक लोगों पर शोक करते हैं।

1698
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 12

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥२-१२॥

na tvevāhaṁ jātu nāsaṁ na tvaṁ neme janādhipāḥ | na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param || 2-12 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

ऐसा कभी नहीं था जब तुम नहीं थे, या मैं नहीं था या यहां उपस्थित सारे योद्धा नहीं थे। और ना ही भविष्य में कभी हम नहीं होंगे।

1741
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥२-१३॥

dehino'sminyathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā | tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati || 2-13 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिस प्रकार आत्मा, बाल्यावस्था, युवाकाल, और बुढापे के दैहिक रूपान्तरण से गुज़रती है, उसी प्रकार मृत्यु के समय वह एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है।

1784
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२-१४॥

mātrāsparśāstu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ | āgamāpāyino'nityāstāṁstitikṣasva bhārata || 2-14 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे कुन्तिपुत्र, इन्द्रियों और उनके अनुरूपी विषय-वस्तुओं की अंतःक्रिया ही ठंडक, गर्मी, सुख और दुःख जैसी संवेदनाएं उत्पन्न करती हैं। ये संवेदनाएं अस्थायी होने के कारण आती-जाती रहती हैं। अतएव, हे भारत, तुम इनका सहन करो।

1827
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२-१५॥

yaṁ hi na vyathayantyete puruṣaṁ puruṣarṣabha | samaduḥkhasukhaṁ dhīraṁ so'mṛtatvāya kalpate || 2-15 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे आर्य, एक संयमी जो सुख और दुःख दोनों में संतुलित रहता है, और अशांत नहीं होता, वह अवश्य मोक्ष की प्राप्ती के योग्य है।

1870
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 15 के पश्चात चिंतन
अर्जुन शरीर की मृत्यु या उसके जाने से मोह ग्रसित थे, किंतु श्री कृष्ण अर्जुन के इस शोक से सहमत नहीं थे और वे अर्जुन को स्मरण दिलाते हैं कि सभी जीव नित्य हैं। कृष्ण कहते हैं कि स्वयं उनका, अर्जुन का और रणभूमि पर उपस्थित सभी योद्धाओं के व्यक्तित्व सदैव कायम रहते हैं - वे अनादि काल से अस्तित्व में हैं और भविष्य में भी वे निरंतर अस्तित्व में रहेंगे। अर्जुन वेद-शास्त्र में निपुण हैं और वे कृष्ण के मित्र भी हैं, किंतु इस विद्वत्तापूर्ण संभाषण के भावी श्रोताओं के लिए अर्जुन केवल इस प्रवचन की प्रेरणा हेतु भ्रांति व व्याकुलता को प्रकट कर रहे हैं। अर्जुन को सिद्धपुरुष माना जाता है और इसलिए वे अविद्या और भ्रम से बिलकुल ही परे हैं। हालाँकि आत्मा नित्य होती है, किंतु भौतिक नश्वर शरीर में यह लक्षण नहीं होता। एक शरीर, जन्म, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, बुढापा, रोग और मृत्यु से हो कर गुज़रता है। मृत्यु के समय, आत्मा अपने कर्म के अनुसार एक दूसरे शरीर में स्थानांतरण कर इस भौतिक आवर्तन को फिर से प्रारंभ करती है। जो स्थूल शरीर और आत्मा के बीच का अंतर जानते हैं, वे कभी भी निरंतर बदलते शरीर से भ्रमित नहीं होते। कहा जाता है कि देहबद्ध चेतना के पांच स्तर होते हैं जिन्हे पंच-कोश कहा जाता है - अन्नमय (आहार द्वारा अपने अस्तित्व को तृप्त करना, जैसा कि बच्चों में देखा जाता है), प्राणमय (शरीर के पालन-पोषण की आवश्यकता की जागरूकता होना), मनोमय (मानसिक अभिज्ञता का स्तर), विज्ञानमय (उच्चतर ज्ञान के माध्यम से चेतना का विकास, इस समझ के साथ कि आप यह नश्वर शरीर नहीं बल्कि एक आत्मा हो), एवं आनन्दमय (स्वयं को कृष्ण का अवयवभूत अंश समझकर उनसे अपना नाता बढ़ाने की साधना करना)। इनमें से पहले तीन स्तर - अन्नमय, प्राणमय, और मनोमय, सांसारिक भोग के जंजाल में फंसे सभी जीवों से जुड़े है। विज्ञानमय और आनन्दमय स्तर उनसे जुड़े हैं जिन्होने आत्म-साक्षात्कार (विज्ञान) एवं परिपूर्णता (आनन्द) प्राप्त कर ली है। जो सुप्त एवं आलसी होते हैं, वे मात्र दैहिक पहचान में डूबे रहते हैं, वे कभी भी अपने संवेदी धारणा से परे की अलौकिक अनुभूति नहीं पा सकते। जिन्हें आत्मा का ज्ञान ही नहीं होता, वे गर्मी और ठंड़क, सुख और दुःख, प्रसन्नता और पीड़ा, जन्म और मृत्यु जैसी जीवन के अनुभूतियों का वे अनुभव करते हैं। परन्तु जो लोग जीवन की दैहिक धारणा से विमुक्त होते हैं, वे चेतना की जगत में सजग होते हैं और इस संसार में प्रतिकूल या विरोधात्मक परिस्थितियों के बावजूद वे सदैव अपना संतुलित जीवन बनाए रखते हैं। वे सदैव शांत चित्त होते
1913
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२-१६॥

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ | ubhayorapi dṛṣṭo'ntastvanayostattvadarśibhiḥ || 2-16 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

वह जो अस्थायी है उसका शाश्वत अस्तित्व नहीं होता। वह जो शाश्वत है उसका विनाश या विकार नहीं होता। सत्य-द्रष्टाओं ने इन दोनों की वैधानिक स्थितियों को साकार किया है।

1956
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥२-१७॥

avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṁ tatam | vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati || 2-17 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

यह निश्चित रूप से जानो कि संपूर्ण शरीर में व्याप्त आत्मा अविनाशी होती है। इस अविनाशी आत्मा का कोई भी नाश नहीं कर सकता।

1999
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥२-१८॥

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ | anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata || 2-18 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

देहबद्ध आत्मा शाश्वत, अविनाशी, और अपरिमित होता है। केवल शरीर नश्वर होता है। इसलिए हे अर्जुन, युद्ध करो !

2042
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 18 के पश्चात चिंतन
यहां श्री कृष्ण दोहरा रहे हैं कि चेतना (आत्मा) जड़ पदार्थ से श्रेष्ठ होती है। डार्विन के समय से ही नहीं बल्कि प्राचीन भारत के कुछ तत्त्वज्ञानीयों, जैसे की चार्वाक, से लेकर वर्तमान के समय तक, कुछ लोग सोचते हैं कि जीवन जड़ पदार्थ से उत्पन्न होता है। महा विस्फोटवाद (बिग बैंग थियोरी) और अन्य समकालीन वैज्ञानिक विचार भी इस मत का समर्थन करते हैं। परन्तु इस सोच की समस्या यह है कि ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो यह समझा सके, या इस बात का प्रदर्शन कर सके कि बेजान जड़ पदार्थ से जीवन के आसार कैसे विकसित हुए। जिस प्रकार डार्विन के अनुयायीगण विकासवाद को समझते हैं, उस विचार का काफ़ी हद तक जीवाश्म के प्रमाणों द्वारा खंडन हो चुका है क्योंकि उनमें कोई भी 'संक्रातिक प्रजातियां' पाई नहीं गई हैं जो आदिम प्रजातियों से लेकर विकसित प्रजातियों तक, जीव-जंतुओं के क्रमिक विकास को निश्चित रूप से व्यक्त कर सके। और तो और, कोई भी योग्य सैद्धांतिक रूपरेखा उपलब्ध नहीं है जो जड़ पदार्थ की उत्पत्ति को स्पष्ट कर सके। ऐसे बहुत से सिद्धांत, नए और प्राचीन, जो जड़ पदार्थ को जीवन का स्रोत बताते हैं, वे मूलतः अनेक रूप से दोषपूर्ण हैं। दूसरी ओर, अति सूक्ष्म जीव-जंतुओं जैसे कि फ़्लाजेल्लम (Flagellum) से लेकर बृहतकाय प्राणियों तक, जैसे कि हाथी और व्हेलों के पर्यावेक्षण से यह बात स्वतः सिद्ध है कि जीवन का स्रोत केवल जीवन ही हो सकता है। अतएव, जीवन के विषय पर वैदिक दृष्तिकोण यह है कि सभी जीव एक प्रज्ञ जीवन स्रोत से उत्पन्न होते हैं और वह स्रोत हैं श्री कृष्ण। ब्रह्माण्ड और जीवन की सृष्टि के कारण को खोज निकालने की वैज्ञानिक दिलचस्पि अवश्य प्रशंसनीय है। परन्तु जब सारे उचित एवं इमानदार अन्वेषण हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचाते हैं कि जीवन/चेतना कोई जड़ पदार्थ का उपोत्पाद नहीं है, और चूंकि एक 'प्रज्ञ योजना' (Intelligent Design) का नक्शा हर जगह एवं सभी वस्तुओं में दिखाई देता है, तो समझदारी से यह मान लेना चाहिए कि महत्प्रज्ञा (परम चेतना) ही जड़ पदार्थ, जगत और सभी जीवित वस्तुओं का मूल कारण है।
2085
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 19

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥२-१९॥

ya enaṁ vetti hantāraṁ yaścainaṁ manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṁ hanti na hanyate || 2-19 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो यह समझते हैं कि यह (आत्मा) हत्या कर सकता है, या इसकी हत्या की जा सकती है, दोनों ही वे अज्ञानी हैं क्योंकि आत्मा ना तो हत्या कर सकता है न उसकी मृत्यु होती है।

2128
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 20

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२-२०॥

na jāyate mriyate vā kadācinnāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre || 2-20 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

आत्मा ना तो कभी जन्म लेता है न मरता है। उसका न कभी सृजन हुआ था न कभी सृजन होगा। वह अजात, नित्य, शाश्वत व कालातीत है - भौतिक शरीर के नष्ट हो जाने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता।

2171
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२-२१॥

vedāvināśinaṁ nityaṁ ya enamajamavyayam | kathaṁ sa puruṣaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam || 2-21 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे पार्थ, जब आत्मा नित्य, अजात, व अविनाशी है तो कोई कैसे और किसका वध कर सकता है?

2214
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 21 के पश्चात चिंतन
प्रायः यह माना जाता है कि ईश्वर ने, या किसी उच्च ज्ञान के स्रोत ने इस संसार में जीवन को रचा है, किंतु यहां श्री कृष्ण कहते हैं की आत्मा का वास्तव में कभी सृजन नहीं होता। कृष्ण के नित्य अंश के रूप में, परम चेतना के अंश के रूप में आत्मा नित्य है। परम सत्य की वैदिक धारणा में, कृष्ण निरंतर अपने शक्तियों के साथ सदैव अस्तित्व में रहते हैं। इस मापदण्ड के अनुसार चेतना का कभी सृजन नहीं होता; वह तो सदैव परम सत्य के अंश के रूप में अपने अस्तित्व को बनाए रखता है। चेतना (आत्मा) के लक्षण इस प्रकार वर्णित हैं - अजन्मा, नित्य, अविनाशी और कालातीत - वह वस्तु जिसका शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नाश नहीं होता। काल के प्रभाव को भौतिक शरीर के विकास, पोषण, उपोत्पाद, वृद्धावस्था, सिकुड़ना, और मृत्यु जैसी दृष्टिगत घटनाओं से समझा जा सकता है। किंतु चेतना (आत्मा) जड़ पदार्थ के प्रभाव से परे होता है, वह कालातीत भी होता है, अतएव कभी भी उसकी आयुर्वृद्धी नहीं होती, उसका जरण, सिकुड़ना, या उसकी कभी मृत्यु भी नहीं होता। कुछ धार्मिक परंपराओं में कभी कभी सृष्टा (जगत के रचनाकार) की कल्पना, आकाश में बैठे एक बूढे-बाबा के रूप में की जाती है। स्वाभाविक तौर पर उन्हें वृद्ध माना जाता है क्योंकि आखिर बहुत समय पूर्व इस समस्त जगत का जन्म उन्हीं के द्वारा हुआ था, और इसलिए उम्र में वे सबसे बुजुर्ग हैं। किंतु यहां भी भगवद्गीता की अवधारणा विशेष रूप से भिन्न है। चेतना (आत्मा) सदैव नवीन रहता है और चेतना (आत्मा) का स्रोत - परम चैतन्य श्री कृष्ण, सदैव स्थिर-यौवन वाले होते हैं, कोइ वृद्धायुश वाले नहीं। सांसारिक मामलों में संलग्न रहनेवाले और भगवद्गीता की प्रज्ञता को अनदेखा करनेवाले, जीवन की शारीरिक धारणा से उपर उठने और जड़ पदार्थ और चेतना (आत्मा) के बीच का अंतर पहचानने की साधना को सदैव कठिन समझेंगे।
2257
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२-२२॥

vāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro'parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā nyanyāni saṁyāti navāni dehī || 2-22 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिस तरह हम पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करते हैं उसी तरह आत्मा भी पुराने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण करता है।

2300
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२-२३॥

nainaṁ chindanti śastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ | na cainaṁ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ || 2-23 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

आत्मा को कोई अस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता, पानी भिगो नहीं सकती, और हवा सुखा नहीं सकती।

2343
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 24

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२-२४॥

acchedyo'yamadāhyo'yamakledyo'śoṣya eva ca | nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo'yaṁ sanātanaḥ || 2-24 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

आत्मा अविनाशी है, अदाह्य है (जलाया नहीं जा सकता), अघुलनशील है, और उसे मुरझाया नहीं जा सकता। वह नित्य है, सर्वव्यापी है, अपरिवर्ती है, अचल और सनातन है।

2386
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 25

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥२-२५॥

avyakto'yamacintyo'yamavikāryo'yamucyate | tasmādevaṁ viditvainaṁ nānuśocitumarhasi || 2-25 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

कहते हैं कि वह अव्यक्त है, अचिन्त्य है, और अविकारी है। इस तरह यदि तुम आत्मा के लक्षणों को समझो तो तुम्हारा शोक जताना उचित नहीं।

2429
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 25 के पश्चात चिंतन
उपर्युक्त श्लोकों में आत्मा के दिव्य स्वभाव को स्पष्ट रूप से बताया गया है। उसे कोई काट नहीं सकता, पानी या हवा उसे जला या स्पर्श नहीं कर सकता। दूसरी ओर एक भौतिक शरीर इन सबके अधीन होता है। चेतना (आत्मा) को नित्य कहा जाता है क्योंकि उसे नष्ट करना असंभव है। वह सर्वव्यापी है क्योंकि वह संपूर्ण शरीर को सजीव बनाता है और शारीरिक अंगो को संवेदनशीलता प्रदान करता है। वह अपरिवर्ती है क्योंकि वह वास्तव में जैसा है (शुद्ध चेतना) निरंतर वैसा ही रहता है, कुछ और नहीं बन जाता। वह अचल है क्योंकि वह सदैव अपने संवैधानिक स्थान पर स्थिर रहता है। वह सनातन है क्योंकि वह सबसे प्राचीन है। वह अव्यक्त है क्योंकि वह इन्द्रियों से अगोचर है। वह अचिन्त्य है क्योंकि वह मानसिक कल्पना-शक्ति से परे है, और वह अविकारी है क्योंकि वह परम सत्य का अनन्य अंश
2472
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 26

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥२-२६॥

atha cainaṁ nityajātaṁ nityaṁ vā manyase mṛtam | tathāpi tvaṁ mahābāho naivaṁ śocitumarhasi || 2-26 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे महाबाहु, यदि तुम यह भी मान लो कि आत्मा नित्य जन्म और मृत्यु के अधीन है, तब भी शोक का कोई कारण नहीं है।

2515
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 27

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-२७॥

jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṁ janma mṛtasya ca | tasmādaparihārye'rthe na tvaṁ śocitumarhasi || 2-27 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

क्योंकि जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। जिसकी मृत्यु हो गई है, उसका जन्म निश्चित है। अतएव जिसे टाल नहीं सकते उस पर तुम्हें शोक करना उचित नहीं।

2558
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२-२८॥

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata | avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā || 2-28 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे भारत, जन्म से पहले सभी जीव अव्यक्त होते हैं, जन्म और मृत्यु के बीच वे व्यक्त होते हैं, और मृत्यु के पश्चात फिर अव्यक्त हो जाते हैं। तो इसमे शोक का कारण कहां है?

2601
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 29

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२-२९॥

āścaryavatpaśyati kaścidēnam āścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ | āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti śrutvāpyenaṁ veda na caiva kaścit || 2-29 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

कुछ लोग आत्मा को आश्चर्यजनक मानते हैं, कुछ आश्चर्यजनक कहकर उसका वर्णन करते हैं, अन्य यह सुनते हैं कि वह आश्चर्यजनक है - और कुछ, सुनकर भी कुछ नहीं जानते।

2644
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 30

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-३०॥

dehī nityamavadhyo'yaṁ dehe sarvasya bhārata | tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṁ śocitumarhasi || 2-30 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

यह आत्मा जो हर एक जीव-जंतुओं के शरीर में वास करती है, वह नित्य और अवध्य होती है, हे भारत। इसलिए तुम्हें किसी पर भी शोक नहीं करना चाहिए।

2687
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 30 के पश्चात चिंतन
आत्मा को समझना कठिन है, क्योंकि वह दिव्य एवं अलौकिक होती है, और उसे किसी भी भौतिक इन्द्रियों से देखा नहीं जा सकता, इस संसार के सबसे शक्तिशाली माइक्रोस्कोप द्वारा भी नहीं। उसका आकार आणविक होता है और केवल परिप्रज्ञता से उसे परखा जा सकता है। प्रत्येक आणविक आत्मा पांच तरह के सूक्ष्म प्राण-वायु (प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान) के मध्य स्थित होती है। वह हृदय में स्थित होता है और पूरे शरीर में अपना प्रभाव रखता है। आत्मा की सूक्ष्मता और शरीर में उसके स्थान का कुछ अनुमान देने के लिए, श्वेताश्वतरोपनिषद् और मुण्डकोपनिषद् में हमें यह जानकारी दी गई है - बालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ एक बाल के उपरी सतह को जब सौ भागों में बाँटा जाए, और इन प्रत्येक भागों को फिर सौ बार बाँटा जाए, तब प्रत्येक परिणामी भाग का माप एक आत्मा के माप के बराबर होगा। (श्वेताश्वतरोपनिषद् ५.९) एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ आत्मा आकार में आणविक होता है और केवल विशुद्ध बुद्धिशक्ति से समझा जा सकता है। यह आणविक आत्मा पांच तरह की वायुओं में तैर रही होती है, हृदय-स्थित होती है, और देहधारी जीवों के शरीर में वह अपना प्रभाव सर्वत्र फैलाती है। जब इन पांच प्रकार की भौतिक वायुओं के दूषण की मुक्ति से आत्मा की शुद्धी होती है, तब उसका अलौकिक प्रभाव प्रकट होता है। (मुण्डकोपनिषद् ३.१.९) देहधारी जीवों के लिए जन्म और मृत्यु का सांसारिक-चक्र एक प्राकृतिक घटना समझा जाता है। हालाँकि इस विचार को भाग्यवादी धारणा भी समझा जाता है, जन्म और मृत्यु दोनों ही देहधारी जीव के लिए अवांछनीय अनुभूतियां हैं। जीवन के अनुभव के पश्चात कोई भी स्वस्थ-चित्त व्यक्ति मरना नहीं चाहेगा - सभी जितना लंबा हो सके उतना जीना चाहते हैं। इस उद्देश्य से, आज-कल करामाती औषधियों के उत्पादक हमें चिरायु बनाने का भरोसा देते हैं, हालाँकि वर्तमान में ऐसी कोई भी जीवनप्रद औषधी उपलब्ध नहीं है। सभी को मरना तो है किंतु मरने से पहले, ये करामाती औषधियां और डाक्टरों की फीस हमारी पारिवारिक भाग्य-संपत्ति का दिवाला अवश्य निकाल देंगी। कुछ भी हो, मृत्यु अवश्य एक अस्वाभाविक अनुभूति है। यह तथ्य कि सभी चिरकाल जीने की आशा रखते हैं, यह इस बात का संकेत देती है कि जन्म और मृत्यु के परे, जीवन की एक विशुद्ध स्थिति भी मौजूद है। अवश्य वह मौजूद है, और इस अध्याय के दौरान श्री कृष्ण इस विषय को और विस्तृत रूप से बताएंगे।
2730
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 31

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२-३१॥

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi | dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate || 2-31 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

और तो और, तुम्हारे स्वधर्म के अनुसार, तुम्हें झिझकना नहीं चाहिए, क्योंकि एक क्षत्रिय के लिए धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करने से बेहतर अन्य कोई कर्म नहीं है।

2773
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 32

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२-३२॥

yadṛcchayā copapannaṁ svargadvāramapāvṛtam | sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam || 2-32 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे पार्थ, केवल सबसे भाग्यशाली क्षत्रियों को ही ऐसे युद्ध में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है, जो स्वतः तुम्हारे सामने स्वर्ग-द्वार बनकर आया है।

2816
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 33

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥२-३३॥

atha cettvamimaṁ dharmyaṁ saṅgrāmaṁ na kariṣyasi | tataḥ svadharmaṁ kīrtiṁ ca hitvā pāpamavāpsyasi || 2-33 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

किंतु यदि तुम इस धर्मयुद्ध में भाग नहीं लेते हो, तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, यश तुम्हें त्याग देगा, और तुम पाप-ग्रस्त हो जाओगे।

2859
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 34

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥२-३४॥

akīrtiṁ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te'vyayām | sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate || 2-34 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

आने वाले हर समय में लोग तुम्हारी अकीर्ति को दोहराते रहेंगे, और जो महान होते हैं, उनके लिए अपयश मृत्यु से भी बदतर होता है।

2902
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 35

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२-३५॥

bhayādraṇāduparataṁ maṁsyante tvāṁ mahārathāḥ | yeṣāṁ ca tvaṁ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam || 2-35 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

महारथी योद्धा यह सोचेंगे कि भय के कारण तुम युद्ध से भाग गए। तुम्हारा अत्यंत आदर करनेवाले तुम्हे अपनी नजरो से गिरा देंगे।

2945
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 36

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥२-३६॥

avācyavādāṁśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ | nindantastava sāmarthyaṁ tato duḥkhataraṁ nu kim || 2-36 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

तुम्हारे शत्रु अपमानजनक वचनों से तुम्हारी वीरता का तिरस्कार करेंगे। इससे बढ़कर दुखदाई स्थिति और क्या हो सकती है?

2988
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 37

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥२-३७॥

hato vā prāpsyasi svargaṁ jitvā vā bhokṣyase mahīm | tasmāduttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ || 2-37 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे कौन्तेय, यदि तुम मारे जाते हो तो तुम्हे स्वर्ग प्राप्त होगा, और यदि तुम विजयी होते हो तो तुम इस पृथ्वी पर राज करोगे। अतः, अपनी सफलता पर विश्वास रखो - उठो और युद्ध करो!

531
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 38

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२-३८॥

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau | tato yuddhāya yujyasva naivaṁ pāpamavāpsyasi || 2-38 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

सुख हो या दुःख, लाभ हो या नुकसान, विजय हो या पराजय, सदैव धीरज रखो - युद्ध करो, और इस तरह तुम पाप से बच जाओगे।

574
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 38 के पश्चात चिंतन
सामाजिक व्यवस्था के अनुसार अर्जुन एक क्षत्रिय थे और वे शूरवीरों के वर्ग के सदस्य थे। दरसल, धर्म को कायम रखना एवं आक्रांताओं से राज्य की सुरक्षा करना अर्जुन के विधिपूर्ण कर्तव्य थे। विधि और सामाजिक नियमों के अनुसार, अर्जुन और उनके भाई, शासन के न्यायपूर्ण वारिस थे, फिर भी उनके चाचा धृतराष्ट्र ने सिंहासन को हड़प लिया था। अर्जुन, उनकी पत्नी द्रौपदी, उनकी माता कुन्ती और उनके भाई युधिष्ठिर, भीम, सहदेव, और नकुल, सभी को कपट से राज्य से निर्वासित कर दिया गया था। श्री कृष्ण अर्जुन का स्वभाव जानते हैं, इसलिए वे अर्जुन की क्षत्रियता को उकसा रहे हैं ताकि वे उठकर युद्ध करें। कृष्ण अर्जुन को स्मरण दिलाते हैं कि यदि वे अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं तो उनके भाग्य में केवल अपमान उनकी प्रतीक्षा करेगी। उनके शत्रु बुरा-भला कहकर उन्हें कायर घोषित कर देंगे। कर्तव्यों की इस तरह अवहेलना करना यश की ओर नहीं बल्कि अपयश की ओर ले जाती है। परिस्थिति कैसी भी हो, युद्ध की ललकार सुनकर एक क्षत्रिय को कभी भी अपने कर्तव्यों का परित्याग नहीं करना चाहिए। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यदि वे युद्ध में राज्य की रक्षा करते हुए अपने प्राण उत्सर्ग करता है तो ऐसी वीरता का कार्य उन्हें अगले जन्म में एक ऊँचे पद पर स्थापित करेगी। अथवा, कृष्ण कहते हैं, यदि वे युद्ध में विजयी होते हैं तो उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त होगा और वे यहां, पृथ्वी पर इसका भोग करेंगे। हर हालत में, कृष्ण दृढ़तापूर्वक अर्जुन को अपने कर्तव्य का परित्याग न करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
617
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 39

एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥२-३९॥

eṣā te'bhihitā sāṅkhye buddhiryoge tvimāṁ śṛṇu | buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṁ prahāsyasi || 2-39 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे अर्जुन, हे पार्थ, मैने तुम्हें आत्मा (व्यक्तिगत चेतना) का ज्ञान प्रदान किया है। अब यह सुनो कि इस पर अमल कैसे करें, जिसके सहारे तुम कर्म के बन्धन से मुक्त हो पाओगे।

660
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 40

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥२-४०॥

nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate | svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt || 2-40 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इस धर्म का अमल करने में ना कोई नुकसान है और न ही इसके प्रतिफल में कोई कमी है। इस धर्म के अन्तर्गत थोड़ा सा परिश्रम भी एक जीव को महाभय से बचाता है।

703
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 41

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥२-४१॥

vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana | bahuśākhā hyanantāśca buddhayo'vyavasāyinām || 2-41 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे कुरु वंशज, आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता केंद्रित व अनन्य होती है, जब कि प्रापंचिक सुख की कामना करनेवालों की बुद्धि बहुत सी शाखाओं में विभाजित होती है।

746
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 42

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥२-४२॥

yāmimāṁ puṣpitāṁ vācaṁ pravadantyavipaścitaḥ | vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ || 2-42 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे पार्थ, जो अल्पबुद्धि होते हैं वे वेदों के गलत अर्थ निरूपण से यह दावा करते हैं कि सृष्टि का कोई ईश्वरीय सिद्धांत ही नहीं होता। अतः वे केवल उन वाक्यों का गुणगान करते हैं जो उनके इन्द्रियों को सुखदायक लगे।

789
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 43

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥२-४३॥

kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām | kriyāviśeṣabahulāṁ bhogaiśvaryagatiṁ prati || 2-43 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

चूंकि उनके हृदय स्वार्थि मनोकामनाओं से भरे होते हैं, और चूंकि स्वर्ग की प्राप्ति ही उनके जीवन का लक्ष्य होता है, वे ऊँचा जन्म, धन और सत्ता प्रदान करनेवाले कर्मकाण्ड के अनेक अनुष्ठानों की संस्तुति करते हैं जो उन्हें भोग व ऐश्वर्य की ओर ले चलते हैं।

832
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 44

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥२-४४॥

bhogaiśvaryaprasaktānāṁ tayāpahatacetasām | vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate || 2-44 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इस तरह के इरादों को लेकर, इन्द्रिय तृप्ति और सांसारिक भोग का चिंतन करनेवाले ये लोग, कभी भी परम सत्य की धारणा के लिए आवश्यक मानसिक संकल्प जुटा नहीं पाते।

875
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 44 के पश्चात चिंतन
मनुष्य जाति में अपने शरीर को त्याग कर पशु या अन्य निम्न जातियों में जन्म पाने के भय को ही उपर्युक्त श्लोक में कथित सबसे बड़ा भय (महाभय) कहा गया है। कुछ लोग समझते हैं कि मनुष्य जाति की एक विशेष प्रकार की चेतना या आत्मा होती है, और पशु आदि जातियों की अन्य प्रकार की आत्मा होती है। परन्तु वास्तव में मनुष्य जाति और पशु जाति की आत्माओं में कोई अंतर नहीं होता। सभी जीव अपने कर्मों के अनुसार कई निम्न प्रजातियों में देहांतरण कर, अंत में मनुष्य जाति को प्राप्त करते हैं। मनुष्य जीवन हमें आत्म-साक्षात्कार या आध्यात्मिक विद्या एवं आध्यात्मिक जागृति की साधना करने का अवसर प्रदान करती है। सदैव ऐसा नहीं होता कि आत्म-साक्षात्कार की साधना करनेवाले एक ही बार में या एक ही जीवनकाल में सफलता प्राप्त कर लें। परन्तु श्री कृष्ण हमें आश्वासन देते हैं कि आत्म-साक्षात्कार के पथ पर थोड़ा सा परिश्रम भी हमें सबसे घोर भय, यानि कि निम्न प्रजातियों जन्म लेने के भय से बचाता है। आत्म-साक्षात्कार की परिपूर्णता को योग प्रणाली में समाधि, अर्थात हमारी चेतना की पूर्ण रूप से परम सत्य में तन्मयता को कहते हैं। एक भक्ति-योग का अनुयायी यदि दृढ़ निश्चय के साथ श्री कृष्ण के उपदेशों का अनुसरण करता है तो उसे ऐसी आत्म-साक्षात्कार की अवस्था प्राप्त होती है। ऐसी स्थिति केवल मनुष्य जीवन की प्राप्ती के महान वरदान से ही संभव हो सकती है। परन्तु, यदि कोई मनुष्य, आत्म-साक्षात्कार के अवसर की उपेक्षा करता है, तो वह अवश्य पशुजाति या पशुओं से भी निचली प्रजातियों में जन्म का जोखिम उठाता है। प्रायः इस बात पर चर्चा तो होती है कि कभी कभी कुत्ते और बिल्लियों के जीवन भी कई मनुष्यों के जीवन से अधिक आरामदेह होते हैं, और यह बात खासकर पश्चिमी देशों के कुत्ते और बिल्लियों के मामले में तो बिलकुल सही है। किंतु ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया जाता है कि मनुष्य जीवन को खोकर हम किसी धनवान अमरीकी परिवार में अच्छे खाते-पीते पालतु कुत्ते या बिल्ली बन जाएंगे। हम ऐसे पशु भी बन सकते हैं जिसे जंगली जानवर ज़िन्दा चबा जाएं या समुंदर के परभक्षि चीरकर निगल जाएं। निस्संदेह, कुछ कहे बिना ही हम यह मान सकते हैं कि इस तरह का जीवन और मृत्य अत्यंत ही दुःखदायक होता है। अतः पशु-जीवन में पाए जानेवाले अनावश्यक पीड़ाओं से बचने के लिए एक मनुष्य को भगवद्गीता में निरूपित आत्म-साक्षात्कार के पथ पर दृढ़ निश्चय और लगन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
918
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 45

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२-४५॥

traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna | nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān || 2-45 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

वेद त्रिगुणों पर आधारित विषयों की चर्चा करते हैं। हे अर्जुन, विशुद्ध आध्यात्मिक चेतना में स्थित रहकर, लाभ और रख-रखाव के उद्यम से मुक्त होकर, द्वन्द्वमुक्त बनो। इस तरह तुम इन त्रिगुणों से उपर उठ पाओगे।

961
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 46

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥२-४६॥

yāvānartha udapāne sarvataḥ samplutodake | tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ || 2-46 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

एक विशाल सरोवर उन सभी उद्देश्यों की पूर्ती कर सकता है जो एक छोटा तालाब करता है। उसी तरह, एक परम सत्य का जानकार, वेदों में निहित सभी उद्देश्यों की पूर्ती कर सकता है।

1004
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२-४७॥

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana | mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo'stvakarmaṇi || 2-47 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

तुम्हारे कर्मों के करने पर तुम्हारा अधिकार है, किंतु उन कर्मों के फलों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। अपने कर्मों के फलों से कभी प्रेरित न हो, और न अपने निर्धारित कर्मों को न करने की सहजप्रवृत्ति से लगाव रखो।

1047
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥२-४८॥

yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga ucyate || 2-48 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे धनंजय, योग में सुदृढ़ रहो, मोह-रहित होकर अपने कर्मों को करो, एवं सफलता हो या विफलता, दोनों में धीरज रखो। इस तरह के संतुलन को ही योग कहा जाता है।

1090
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥२-४९॥

dūreṇa hyavaraṁ karma buddhiyogāddhanañjaya | buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ || 2-49 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे धनंजय, फलाकांक्षी कर्म (कार्य), बुद्धिमत्ता के योग से नीचा होता है। अतः बुद्धिमत्ता का आश्रय लो। फल की आशा में कर्म करनेवाले कृपण होते हैं।

1133
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥२-५०॥

buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte | tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam || 2-50 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

बुद्धिमान, पुण्य एवं पाप कर्म, दोनों से परहेज रखते हैं। अतः योग में नियुक्त रहो क्योंकि योग ही सबसे उत्तम कार्य है।

1176
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥२-५१॥

karmajaṁ buddhiyuktā hi phalaṁ tyaktvā manīṣiṇaḥ | janmabandhavinirmuktāḥ padaṁ gacchantyanāmayam || 2-51 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

बुद्धिमान अपने कर्म के फलों का त्याग कर, भौतिक जन्म और मृत्यु के बंधन से विमुक्त हो जाते हैं। इस तरह वे वह पद प्राप्त कर लेते हैं जो समस्त दुःखों के अतीत है।

1219
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥२-५२॥

yadā te mohakalilaṁ buddhirvyatitariṣyati | tadā gantāsi nirvedaṁ śrotavyasya śrutasya ca || 2-52 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

एक बार यदि तुम्हारी बुद्धी, माया के इस घोर जंगल को पार कर जाए, तब सभी सुने व अनसुने विषयों से तुम विरक्त हो जाओगे।

1262
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 53

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥२-५३॥

śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā | samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi || 2-53 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जब तुम्हारा मन वेदों की मिथ्या प्रस्तुतिकरण के प्रभाव से मुक्त हो जाएगा, तब तुम योग में सिद्धी प्राप्त कर सकोगे।

1305
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 53 के पश्चात चिंतन
परात्परता में स्थित होने का अर्थ है त्रिगुणों से, यानि की तमोगुण, रजोगुण, और सत्त्वगुण, से मुक्त होना। त्रिगुणों से उपर उठने की साधना को ही योग कहा जाता है। भौतिक जगत में सभी त्रिगुणों के अधीन होते हैं, और केवल एक सच्चा योगी ही इनसे उपर उठ पाता है। हमारे कार्यों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है - वेद द्वारा निर्धारित कार्य (कर्म), निषिद्ध कार्य (विकम), और दिव्य कार्य (अकम)। कर्म का अर्थ है वे कार्य जिन्हें करने से पुण्य प्राप्त होता है और कभी कभी वे कर्ता को उंचे लोकों में पदोन्नती दिलाते हैं या एक उच्च वैभवपूर्ण जीवन प्रदान करते हैं। जो वेदों के व्यादेशों के विरुद्ध किए जाते हैं, वे विकर्म हैं, और जो कर्ता और अन्य जीव-जन्तुओं के लिए पीड़ा का कारण बनते हैं। जिन कर्मों की न अच्छी न बुरी प्रतिक्रिया होती है, उन्हें अकर्म कहा जाता हैं। एक बुद्धिमान व्यक्ति जो योग के विज्ञान को समझता है वह सदैव अकर्म करने का प्रयास करता है। ऐसे योगियों को भक्ति-योगी कहा जाता है जो आसानी से दिव्य अलौकिक भाव में स्वयं को स्थापित कर सकते हैं। अन्य योग प्रणालियां जैसे कि अष्टांग-योग, राज-योग, कुण्डलिनी-योग, हठ-योग और क्रिया-योग अभ्यर्थी को अलौकिक स्थान पर तो पहुंचा सकते हैं, किंतु इनके पथ, विशेषकर इस आधुनिक युग के लोगों के लिए, बहुत कठिन होते हैं। श्री कृष्ण योगेश्वर हैं - योग के सर्वश्रेष्ठ गुरु, और हालांकि भगवद्गीता में अन्य योग प्रणालियों पर चर्चा तो की गई है, कृष्ण अन्त में भक्ति-योग की ही संस्तुती करते हैं। भक्ति-योगी सदैव योगेश्वर श्री कृष्ण की तृप्ति हेतु भक्ति कार्य में लगे रहते हैं। इस तरह, एक भक्ति योगी सदैव अपने इन्द्रियों को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में रखता है। इन्द्रियों को संपूर्ण वश में किए बिना कोई भी ध्यान या आध्यात्मिक साधना में ठीक से संलग्न नहीं रह सकता। अतएव, एक भक्ति-योगी ही सर्वोच्च योगी है क्योंकि वह सर्वोच्च योग पद्धति में संलग्न है। योग के आठ गूढ सिद्धियां हैं, जिन्हें अष्ट-सिद्धी कहते हैं। ये सिद्धियां हैं - अनिमा-सिद्धी (आकार में बहुत छोटा बन जाना), लघिमा-सिद्धी (हवा से भी हल्का बन जाना), प्राप्ति-सिद्धी (कहीं से भी किसी भी वस्तु को झपट लेना, जैसे कि न्यू योर्क से अपने हाथों को बढ़ाकर भारत में उगते हुए पेढ़ पर से आम तोड़ना), महिमा-सिद्धी (अत्यंत वज़नदार हो जाना), ईशित्व-सिद्धी (अनोखे वस्तुओं की रचना करना या अपनी इच्छानुसार किसी भी वस्तु का नाश करना), वशित्व-सिद्धी (भौतिक पदार्थों का नियंत्रण करना), प्राकाम्य-सिद्धी (अपनी सभी कामनाओं को पूरी करने की क्षमता), और कामावशायिता-सिद्धी (मनचाहा रूप धारण करने की क्षमता)। योगेश्वर श्री कृष्ण में ये सभी अष्ट-सिद्धियां अपनी संपूर्णता में पाई जाती हैं। कई बार योगी यह दावा करते हैं कि उन्होंने एक या अधिक सिद्धियां प्राप्त कर ली है। ऐसी बातें प्राचीन समय में अपेक्षाकृत आम हुआ करती थीं। परन्तु आधुनिक समय में इस तरह का दावा प्रायः छलपूर्ण या मात्र अनुयायी इकट्ठा करने के लिए रचा एक ढोंग है। योग की लोकप्रियता में बढ़ोतरी के साथ-साथ अष्ट-सिद्धी का झूठा दावा करना भी एक लाभदायक व्यापार बन गया है। एक योगी का उच्चतम ध्येय अष्ट सिद्धियों की प्राप्ती नहीं बल्कि भक्ति-योग में समाधी की स्थिती प्राप्त करना होता है, क्योंकि ऐसी उपलब्धी उन्हें जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाती है।
1348
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 54

अर्जुन उवाच ।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥२-५४॥

arjuna uvāca | sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava | sthitadhīḥ kiṁ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim || 2-54 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अर्जुन ने कहा, हे केशव, दिव्य ज्ञान में उत्कृष्टता से स्थित और शुद्ध आध्यात्मिक चेतना में पूर्ण रूप से लीन व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं? उनकी बोली कैसी होती है? उनका उठना-बैठना, चलना-फिरना कैसा होता है?

1391
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 55

श्रीभगवानुवाच ।
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥२-५५॥

śrībhagavānuvāca | prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān | ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate || 2-55 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

भगवान् श्री कृष्ण बोले, हे पार्थ, जब एक जीव अपने मन में प्रवेश करनेवाले सभी कामनाओं का परित्याग कर भीतर से आत्म-संतुष्ट बनता है, तब यह कहा जा सकता है कि वह दिव्य-ज्ञान में स्थित है।

1434
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥२-५६॥

duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ | vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate || 2-56 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

वह व्यक्ति जिसका मन दुःख में भी शांत रहे, जिसे सुख की अभिलाषा न हो, जो सांसारिक बंधनों से, भय से और क्रोध से मुक्त हो, वह स्थिर-बुद्धि का मुनी कहलाता है।

1477
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-५७॥

yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā || 2-57 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो जगत के सभी वस्तुओं से असंलग्न रहे और जो शुभ और अशुभ की प्राप्ति पर हर्षित या क्रोधित न हो, उसकी प्रज्ञा योग में प्रतिष्ठित कहलाती है।

1520
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-५८॥

yadā saṁharate cāyaṁ kūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā || 2-58 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो अपने इन्द्रियों को उसी तरह विषय-वस्तुओं से निर्लिप्त कर सके, जैसे कि एक कछुआ अपने अंगो को अंदर खींचता है, उस व्यक्ति की प्रज्ञा योग में प्रतिष्ठित कहलाती है।

1563
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥२-५९॥

viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasavarjaṁ raso'pyasya paraṁ dṛṣṭvā nivartate || 2-59 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हालांकि एक देहबद्ध जीव विषय वस्तुओं का त्याग तो कर लेता है, फिर भी उनके भोग का स्वाद शेष रह जाता है। परन्तु, परम सत्य के दर्शन से इस दोष का निवारण भी हो जाता है।

1606
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥२-६०॥

yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ || 2-60 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

फिर भी, हे कुन्तिपुत्र, एक विवेकी व्यक्ति के मन को भी अशांत इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।

1649
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 61

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-६१॥

tāni sarvāṇi saṁyamya yukta āsīta matparaḥ | vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā || 2-61 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इन्द्रियों को निग्रह में रखकर, एक संयमी व्यक्ति को मुझ पर अपना ध्यान लगाना चाहिए। इस प्रकार वह दिव्य ज्ञान में दृढ़ स्थित हो जाता है।

1692
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 61 के पश्चात चिंतन
जैसा कि पहले बताया गया है, बहुत सी विभिन्न योग प्रणालियां हैं। श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि अपने इन्द्रियों को इन्द्रीय-तृप्ति के लिए, शब्द, स्पर्श, रुची, सुगंध, और दृष्टि के विषय वस्तुओं से निर्लिप्त करने से, और अपने मन को उन (श्री कृष्ण) पर केन्द्रित करने से, व्यक्ति दिव्य ज्ञान व समाधि में दृढ़ स्थित हो जाता है। आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए, बिना किसी सकारात्मक कर्म के, केवल इन्द्रियों को नियंत्रित करने से कोई लाभ नहीं होता। अनेक योगियों ने इन्द्रियों को पूर्ण रूप से निष्क्रिय बनाने का प्रयास किया है, किंतु विषय वस्तुओं के स्वाद या उन पर मोह के रह जाने से बहुतों का इस प्रयास में पतन हुआ है। जब की कृष्ण के उपदेशों का अनुसरण करनेवाले भक्ति-योगी की इन्द्रियां नियंत्रित रहती हैं, क्योंकि वे चौबीसो घंटे कृष्ण की सेवा में कार्यरत रहते हैं। इसके अलावा, इन्द्रिय तृप्ति की रुची क्रमशः शुष्क होकर लुप्त हो जाती है और एक भक्ति योगी आध्यात्मिक पथ पर निर्बाध प्रगति करने लगता है। जो अपने इन्द्रियों का निग्रह न कर सके वह अपने मन को एकाग्र नहीं कर सकता है। और तो और, सांसारिक क्रियाकलाप से कभी भी इन्द्रीय संतुष्ट नहीं होती। अल्प समय के लिए वे अवश्य तृप्त रहते हैं, किंतु तत्पश्चात पुनः वे और अधिक लोलुपता से जाग उठते हैं। शारीरिक इन्द्रियों के दास कभी भी स्वयं के स्वामी नहीं बन सकते। शुद्ध आध्यात्मिक चेतना या समाधी में पूर्ण रूप से निमग्न रहने का अर्थ है परम पुरुष श्री कृष्ण के प्रति निरंतर जागरूक रहना। मन एवं इन्द्रियों के कृष्ण में निमग्नता को ही कृष्ण भावनामृत कहते हैं।
1735
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२-६२॥

dhyāyato viṣayānpuṁsaḥ saṅgasteṣūpajāyate | saṅgātsañjāyate kāmaḥ kāmātkrodho'bhijāyate || 2-62 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

विषय वस्तुओं पर ध्यान करने से व्यक्ति उनसे बंध जाता है। बंधन से कामना उत्पन्न होती हैं, और कामना से क्रोध प्रकट होता है।

1778
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 63

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥२-६३॥

krodhādbhavati sammohaḥ sammohātsmṛtivibhramaḥ | smṛtibhraṁśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyati || 2-63 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

क्रोध से विमोह उत्पन्न होता है। विमोह से स्मृति-भ्रम होता है। स्मृति-भ्रम से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है।

1821
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 64

रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥२-६४॥

rāgadveṣavimuktaistu viṣayānindriyaiścaran | ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati || 2-64 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

परन्तु, जो व्यक्ति विषय वस्तुओं के मध्य में होते हुए भी अपने मन एवं इन्द्रियों को वश में रख सके, और आसक्ती एवं मोह से मुक्त रह सके, वह दिव्य अनुग्रह प्राप्त करता है।

1864
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥२-६५॥

prasāde sarvaduḥkhānāṁ hānirasyopajāyate | prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate || 2-65 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

दिव्य अनुग्रह की प्राप्ति से सारे दुःख दूर हो जाते हैं। जो व्यक्ति प्रशांत मन पा लेता है, उसमें निस्संदेह दिव्य प्रज्ञता प्रकट हो जाती है।

1907
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥२-६६॥

nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā | na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham || 2-66 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिसमें आत्म-संयम नहीं होता वह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। बिना ज्ञान के समाधि प्राप्त नहीं होती। बिना समाधि के शांति प्राप्त नहीं होती, और बिना शांति के कैसे कोई प्रसन्न हो सकता है?

1950
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 67

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥२-६७॥

indriyāṇāṁ hi caratāṁ yanmano'nuvidhīyate | tadasya harati prajñāṁ vāyurnāvamivāmbhasi || 2-67 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिस किसी भी इन्द्रिय से ग्रस्त अस्थिर मन हो जाए, वह इन्द्रिय बुद्धि को उसी तरह हर ले जाती है जैसे कि समन्दर में एक प्रचंड वायु एक नाव को बहा ले जाता है।

1993
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 68

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥२-६८॥

tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyastasya prajñā pratiṣṭhitā || 2-68 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इसलिए, हे महाबाहु अर्जुन, जिसके इन्द्रिय विषय वस्तुओं से पूर्ण निर्लिप्त होते हैं, वह दिव्य प्रज्ञता में दृढ़ स्थित होता है।

2036
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 68 के पश्चात चिंतन
दुर्भाग्यवश, बहुत से ऐसे धोकेबाज योगी हैं जो धन और शिष्य इकट्ठा करने के लिए तथा-कथित 'आशीर्वाद' देते हैं, यह कहकर कि हिंसा-रहित आहार, यौन-रोकथाम, या नशा परिवर्जन आदि जैसे किसी भी इन्द्रिय-निग्रह की साधना की कोई आवश्यकता ही नहीं। ऐसे धोकेबाज अपने अनुयायिओं को धोका देकर उन्हें यह सोचने पर भटकाते हैं कि वे स्वयं भगवान् हैं और यह कि वे इन्द्रिय-वांछित किसी भी वस्तु का भोग कर सकते हैं। परन्तु यहां पर एक निष्पक्ष चेतावनी दी गई है। ऐसी अनियंत्रित इन्द्रिय सक्रियता दिव्य अनुग्रह या दिव्य ज्ञान नहीं प्रदान करता, बल्कि यह व्यक्ति को पहले बंधन, फिर वर्धित काम वासना, फिर क्रोध, फिर विमोह, स्मृति-भ्रम, बुद्धि-नाश और अंत में सर्वनाश की ओर ले जाती है।
2079
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 69

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२-६९॥

yā niśā sarvabhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti saṁyamī | yasyāṁ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ || 2-69 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो अन्य लोगों के लिए रात है, वह एक आत्म-संयमित संत के लिए दिवस होता है, और जो अन्य लोगों के लिए दिवस है, वह अन्तर्दर्शनात्मक संत के लिए रात होती है।

2122
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥२-७०॥

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṁ samudramāpaḥ praviśanti yadvat | tadvatkāmā yaṁ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī || 2-70 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

ऐसा संत जो काम के निरंतर वेग का सामना करने में अचल रहे, औउन्हें तृप्त करने का प्रयास न करे, वह शांति प्राप्त करता है। नदियों के प्रवेश करने पर भी जिस तरह समंदर शांत रहता है, वह संत भी उसी तरह अप्रभावित रहता है।

2165
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥२-७१॥

vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṁścarati niḥspṛhaḥ | nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati || 2-71 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो व्यक्ति सारे भोग-कामनाओं का परित्याग करे, और जो स्वत्वात्मकता की भावना एवं झूठे अहंकार से मुक्त रहे, केवल वही शांति प्राप्त कर सकता है।

2208
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 72

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥२-७२॥

eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati | sthitvāsyāmantakāle'pi brahmanirvāṇamṛcchati || 2-72 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे पार्थ, परम सत्य की साक्षात्कार के पश्चात व्यक्ति कभी भ्रमित नहीं होता। यदि कोई मृत्यु के समय ऐसी दशा में स्थित रहे, उसे ब्रह्म-निर्वाण या शुद्ध चेतना का निवास प्राप्त होता है, और उसके सारे कष्ट समाप्त हो जाते हैं।

2251
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार श्लोक 72 के पश्चात चिंतन
भगवान् श्री कृष्ण के आदेशों का अनुसरण करके जो परम सिद्धी प्राप्त होती है, यहां उसका वर्णन किया गया है। जो अपना जीवन श्री कृष्ण के उपदेशानुसार व्यतीत करता है उसे मृत्यु के समय ब्रह्म-निर्वाण, वैकुण्ठ लोक प्राप्त होता है, जहां वह सारे कष्टों से मुक्त हो जाता है। तत्त्वदर्षियों के ज्ञान के अनुसार, परम सत्य की साक्षात्कार के तीन स्तर होते हैं - ब्रह्मन, परमात्मा एवं भगवान्। वदन्ति तत् तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ परम सत्य के विज्ञाता इस अद्वय द्रव्य को ब्रह्मन, परमात्मा, या भगवान् के रूप में समझते हैं। (श्रीमद्भागवतम् १.२.११) ब्रह्मन का अर्थ है परम सत्य की निराकार ज्योति या प्रभा। 'ब्रह्मन' शब्द वैदिक ग्रन्थों में सभी जगह पाया जाता है, और भक्ति-योग के विद्वानों के अनुसार, यह शब्द अंततः विष्णु या कृष्ण को ही दर्शाता है। बौद्ध दर्शनशास्त्री निर्वाण को सांसारिक जीवन का अंत और शून्यता में प्रवेश मानते हैं, किंतु भगवद् गीता का ज्ञान बिलकुल भिन्न है। वैदिक शिक्षा में कहीं भी शून्यता की अवधारणा नहीं है। सब कुछ परम सत्य की शक्तियां हैं और इसके बाहर कोई अस्तित्व या अनस्तित्व का समाधेय नहीं है। भक्ति-योग के मुख्य संतो में से विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ब्रह्म-निर्वाण को मुक्ति कहते हैं। उनके शिष्य बलदेव विद्याभूषण ब्रह्म-निर्वाण को परमात्मा समझते हैं, जो मुक्ति के साक्षात रूप, स्वयं विष्णु हैं। रामानुजाचार्य ब्रह्मन को आत्मा, तथा निर्वाण को परमानन्द समझते हैं। मध्वाचार्य ब्रह्म-निर्वाण को भौतिक रूप रहित विष्णु/कृष्ण कहते हैं। किसी भी तरह से, कृष्ण-भक्त कभी भी निराकार ब्रह्मन में या शून्यता में मुक्ति को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे केवल कृष्ण की सेवा चाहते हैं, और वैसे भी वे पहले से ही विमुक्त होते हैं। सभी जीवों के हृदय में प्रतिष्ठित परम सत्य की अनुभूति को ही परमात्मा कहते हैं - जगत के पालनकर्ता जो प्रत्येक भौतिक पदार्थ के कण के भीतर व उनके मध्य में स्थित होते हैं। परम सत्य के व्यक्तित्व-सहित स्वरूप की अनुभूति को ही भगवान् कहते हैं, और यही आत्मानुभूति की चरम सीमा मानी जाती है, क्योंकि इस दशा में हम संपूर्णता में परम सत्य को श्री कृष्ण के साकार रूप में करते हैं, जो स्वयं सभी शक्तियों के मूलस्रोत हैं। कृष्ण के निवास को वैकुण्ठ या गोलोक वृन्दावन कहते हैं। इसके अतिरिक्त, श्लोक ७१ उस मिथ्या-अहम को सूचित करता है जो त्रिगुणो से प्रभावित होकर चेतना से जुड़ जाता है। मिथ्या-अहम, वास्तविक अहम के अस्तित्व को प्रमाणित करता है - वह वास्तविक अहम जो एक जीव की निर्मल प्रज्ञा होती है। स्वयं को केवल एक स्थूल शरीर समझ लेना या स्वयं को इन्द्रियों का भोगी मान लेना, इसी मिथ्या-अहम का कारण व प्रभाव है। मिथ्या-अहम हमें ज्ञानोदय की ओर नहीं, बल्की जन्म और मृत्यु की पुनरावर्ती सांसारिक चक्र की ओर ले जाता है। मिथ्या-अहम अंधकार की परछाई जैसा होता है जो निर्मल ज्ञान को ढक देता है। शुद्ध-अहम और शुद्ध ज्ञान अभेद हैं। स्वयं को परम सत्य का अवयवभूत अंश और कृष्ण का नित्य सेवक जान लेना ही वास्तविक-अहम कहलाता है।
2294
Puran

श्रीमद्भागवत महापुराण

अध्याय 2 • श्लोक क्रमांक 73

ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां
वैयासिक्यां भीष्मपर्वाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥

oṁ tatsaditi śrīmahābhārate śatasāhasryāṁ saṁhitāyāṁ vaiyāsikyāṁ bhīṣmaparvāṇi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṁ yogaśāstre śrīkṛṣṇārjunasaṁvāde sāṅkhyayogo nāma dvitīyo'dhyāyaḥ ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

ॐ तत् सत् - अतः व्यास विरचित शतसहस्त्र श्लोकों की श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में पाए जाने वाले आध्यात्मिक ज्ञान का योग-शास्त्र - श्रीमद् भगवद् गीतोपनिषद् में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से लिए गए सांख्य योग नामक द्वितीय अध्याय की यहां पर समाप्ती होती है।

2337
दैनिक गीता स्वाध्याय

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भक्ति की सभा
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सत्यम् शिवम् सुन्दरम्