श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 1
श्रीभगवानुवाच ।
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥७-१॥
śrībhagavānuvāca | mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṁ yuñjanmadāśrayaḥ | asaṁśayaṁ samagraṁ māṁ yathā jñāsyasi tacchṛṇu || 7-1 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
भगवान श्री कृष्ण ने कहा – हे पार्थ, यह सुनो कि कैसे मन को मुझ पर आसक्त किये योग का अभ्यास करने से, और पूर्ण रूप से मेरा आश्रय लेने से, निश्चित रूप से मुझे जान पाओगे।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥७-२॥
jñānaṁ te'haṁ savijñānamidaṁ vakṣyāmyaśeṣataḥ | yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate || 7-2 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मैं तुम्हे ज्ञान और इसकी प्राप्ति (अनभूति) को समझाता हूँ। एक बार जो तुम इसे समझ लो, तो इस संसार में जानने के लिए कुछ और शेष नहीं रहेगा।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥७-३॥
manuṣyāṇāṁ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye | yatatāmapi siddhānāṁ kaścinmāṁ vetti tattvataḥ || 7-3 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हजारों व्यक्तियों में से कोई एक सिद्धि प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। उन दुर्लभ व्यक्तियों में, जो सिद्धि के लिए प्रयास करते हैं, उनमे से कोई एक ही मुझे वास्तव में जान पाता है।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 3 के पश्चात चिंतन
भगवद्गीता का यह अध्याय ज्ञान-विज्ञान-योग के शीर्षक से जाना जाता है। ज्ञान का अर्थ है स्वयं (आत्मा) का बोध जो हमें आत्मा और शरीर के बीच का अंतर दिखाता है, या दूसरे शब्दों में, यह तथ्य कि स्वयं (आत्मा) शरीर नहीं होता। विज्ञान का अर्थ है ज्ञान का साक्षात्कार या श्रीकृष्ण के साथ स्वयं के आन्तरिक संबंध को समझना। श्रीमद्भागवतम् में भी ज्ञान एवं विज्ञान का उल्लेख इस प्रकार है -
ज्ञानं परम गुह्यं मे यद् विज्ञान समन्वितम् ।
सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥
वेद शास्त्रों में वर्णित श्रीकृष्ण का ज्ञान अत्यंत ही गोपनीय है, और भक्ति के गूढ तत्त्वों को जानने के साथ ही इसकी अनुभूति की जानी चाहिए। (श्रीमद्भागवतम् २.९.३१)
जब हम ज्ञान की बात करते हैं, तो आधुनिक मनुष्य तुरंत ही वैज्ञानिक ज्ञान के बारे में सोचता है कि वही सबसे उचित है। जबकि, भगवद्गीता का ज्ञान, आत्मा के उस ज्ञान को संबोधित करता है, जो जड़-तत्त्व के ज्ञान से या आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान से बिल्कुल ही विपरीत है। जड़-पदार्थ के ज्ञान को अपरा विद्या कहा जाता है, जो आत्मज्ञान से काफी अलग है, और वह कभी भी आत्म-साक्षात्कार की ओर नहीं ले चलता।
लगभग पाँच शताब्दियों पहले, बुद्धिवादी आंदोलन (Rationalist Movement) की शुरुआत से, विज्ञान (Science) ने जड़-पदार्थ से स्वतंत्र चेतना के अभिप्राय को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति और जीवन की उत्पत्ति को समझाने के लिए कई वैज्ञानिक सिद्धांतों को प्रस्तुत किया जाता है, जैसे कि ‘बिग बैंग’ एवं “डार्विनियन इवोल्यूशन”, लेकिन ये स्पष्टीकरण केवल एक परिकल्पना है, इसमे निर्णयात्मक प्रमाण अनुपस्थित हैं।
सदियों से वैज्ञानिक और आस्तिक समुदाय आपस में एक-दूसरे से असहमत रहे हैं, लेकिन हाल ही में ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों अंततः निकट आ सकते हैं। वैज्ञानिक समुदाय में अग्रणी व्यक्ति ‘चेतना’ को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। दरअसल, जीवविज्ञानी और ‘स्टेम सेल’ चिकित्सक, डॉ रॉबर्ट लैंज़ा उनकी किताब, “Biocentrism - How Life Creates the Universe” (जीवन कैसे ब्रह्माण्ड का निर्माण करता है) में इस बात को निर्विवाद रूप से मानते हैं कि ‘चेतना’ से ‘जड़-पदार्थ’ (विषय वस्तु) का विकास हुआ है न की ‘जड़-पदार्थ’ से ‘चेतना’ का। अगर यह मौजूदा चलन जारी रहा तो विज्ञान (Science), बहुत जल्द ‘ज्ञान’ की राह पकड़ सकता है।
यह वैश्विक नज़रिये कि चेतना ही जड़-पदार्थ का स्रोत है, इसे प्रकाशित होने में लंबा समय लगा है। लेकिन जैसा कि श्री कृष्ण ने श्लोक ३ में कहा है, विरले ही सिद्धि के लिए प्रयास करते हैं, और जो वास्तव में श्रीकृष्ण को समझ पाते हैं वे और भी दुर्लभ हैं। इस लक्ष्य से संसार में सभी विद्वान एवं पढ़े-लिखे लोगों को भगवद्गीता से सीख लेनी चाहिए।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७-४॥
bhūmirāpo'nalo vāyuḥ khaṁ mano buddhireva ca | ahaṅkāra itīyaṁ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā || 7-4 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और मिथ्या-अहंकार - ये आठ विभिन्न तत्त्व मेरी भौतिक प्रकृति में समावेशित हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७-५॥
apareyamitastvanyāṁ prakṛtiṁ viddhi me parām | jīvabhūtāṁ mahābāho yayedaṁ dhāryate jagat || 7-5 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
तथापि, हे महाबाहु, यह जानो कि इस निम्न प्रकृति से परे मेरी दिव्य प्रकृति है। वह चेतन शक्ति है जो जीवात्माओं से युक्त है और संपूर्ण जगत का निर्वाह करती है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥७-६॥
etadyonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya | ahaṁ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā || 7-6 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यह समझने की कोशिश करो कि सभी प्राणी इन दो स्रोतों से प्रकट होते हैं और मैं ही संपूर्ण सृष्टि के सृजन और विनाश का कारण हूँ।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 6 के पश्चात चिंतन
यहाँ पर जगत निर्माण के मूल भौतिक तत्त्वों का उल्लेख किया गया है। पृथ्वी, जल, अग्नि, और हवा को अधिकांश भाग में समझना आसान है - जबकि, अदृश्य तत्व ‘ख़म’ या आकाश को समझना मुश्किल है। ‘खम’ (आकाश) को जीवन को समाने वाले स्थान के रूप में परिभाषित किया गया है। बहुत समय से, आधुनिक विज्ञान ने ‘खम’ (आकाश या नभ) को एक मूल भौतिक तत्त्व समझने वाली भगवद्गीता की अवधारणा को अस्वीकार किया है। हालांकि, एक बार फिर से वैज्ञानिक समुदाय को गंभीर परेशानियों का समाना करना पड़ रहा है कि ब्रह्मांड में वे उस पकड़ में न आनेवाले पदार्थ का कैसे पता लगाए जिससे की वे यह समझा सके की ब्रह्मांड कैसे काम करता है। भौतिक विज्ञानियों का कहना है कि यह तत्त्व ब्रह्मांड के ८०% या उससे भी अधिक भाग को बनाती है, लेकिन उनके लिए यह अज्ञात है, और इसका पता लगाने में अब तक वे असमर्थ रहे हैं। उन्होंने इसे ‘डार्क मैटर’ (अज्ञात द्रव्य) कहा है।
१९३३ में “डार्क मैटर” की घटना के अस्तित्व का पता लगाने वाले पहले व्यक्ति कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के स्विस ‘एस्ट्रोफिजिस्ट’ (तारा-भौतिकविद) फ्रिट्ज़ ज़्विकी थे।
ज़्विकी ने कोमा नामक आकाशगंगाओं के समूह में वायरल प्रमेय का उपयोग करके अदृष्ट (अप्रत्यक्ष) द्रव्यमान का प्रमाण प्राप्त किया। ज़्विकी ने इस समूह की कुल द्रव्यमान का अनुमान, समूह के छोड़ पर स्थित आकाशगंगाओं की गति के आधार पर लगाया, और इस प्रकार पाए गए अनुमान की तुलना उन्होंने आकाशगंगाओं की कुल संख्या और समूह की कुल प्रभा पर आधारित अनुमान के मुकाबले की। उन्होंने संख्या और प्रभा द्वारा किए गए आकलन से लगभग चार-सौ गुना अधिक द्रव्यमान पाया! कुंज समूह में दृश्यमान आकाशगंगाओं का गुरुत्वाकर्षण उनकी तेज़ कक्षाओं के अनुपात में बहुत कम होने के कारण कुछ अतिरिक्त की आवश्यकता देखी गई। इसे ‘मिसिंग मास प्रॉब्लम’ (द्रव्यमान अनुपस्थिती की समस्या) के नाम से जाना जाता है। इन निष्कर्षों के आधार पर, ज़्विकी ने अनुमान लगाया कि इस मामले में कुछ अदृश्य द्रव्यमान होना चाहिए जो क्लस्टर (कुंज समूह) को एक साथ रखने के लिए पर्याप्त द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण प्रदान कर रहा है। यही पर ‘डार्क मैटर’ (अज्ञात द्रव्यमान) की खोज की शुरुआत थी।
अठहत्तर (७८) साल के बाद, विज्ञान अभी भी ‘डार्क मैटर’ की तलाश में है। वे जानते हैं कि यह वस्तुतः हर जगह विद्यमान है, परन्तु यह द्रव्यमान पता लगाने के प्रक्रम से बच जाता है और इसलिए वे इसका प्रेक्षण करने में असमर्थ हैं। श्रीमद्भागवतम् एक ऐसे भौतिक तत्त्व की पहचान करता है, जिस के अन्य गुणों में से एक गुण यह है कि यह काफी हद तक पकड़ में न आनेवाली वस्तु है। यह सर्वव्यापी है, लेकिन साथ ही साथ इसका पता लगना असंभव है। भागवतम् के अनुसार इस तत्त्व को ‘नभ’ कहा जाता है, और भगवद्गीता में इसका उल्लेख ‘खम’ कहकर किया गया है।
‘खम’ तत्त्व की गतिविधियों, गुणों और विशेषताओं को वस्तु-समायोजन के लिए स्थान या जगह के रूप में देखा जा सकता है। जगह या स्थान, आंतरिक हो या बाह्य, दोनों को ही खम कहा जाता है। यदि भौतिकविदों द्वारा ध्यान दिया जाए, तो “मिसिंग मास प्रॉब्लम’ (द्रव्यमान अनुपस्थिती की समस्या) खम के लिए उपयुक्त हो सकता हैं। खम एक भौतिक तत्त्व होने के नाते, सैद्धांतिक रूप से इसे एक ‘संख्यात्मक कोड’ सौंपा जा सकता है - फिर उन्हें वह मिल सकता है जो वह ढूंढ रहे हैं।
वैदिक विचार के अनुसार किसी भी वस्तु का महत्त्व उसके गुणों की तुलना में द्वितीय है - इसका अर्थ यह है, कि अन्वेषण के लिए किसी भी पदार्थ के गुणों का ज्ञान होना, उस पदार्थ के हाथ में होने के बराबर या उससे भी बेहतर है। इस हिसाब से, आधुनिक विज्ञान, ‘डार्क मैटर’ का पता लगा चुका है, क्योंकि वैज्ञानिक इसके गुणों को लगभग समझ चुके हैं - परन्तु इसी बात को उन्होंने अभी तक बूझा नहीं है। श्रीमद्भागवतम् में नीचे लिखा श्लोक है -
भूतानां छिद्र-दातृत्वं बहिरन्तरमेव च ।
प्राणेन्द्रियात्मा-धिष्ण्यत्वं नभसो वृत्ति-लक्षणम् ॥
नभस की गतिविधियों और लक्षणों को इस प्रकार देखा जा सकता है कि यह सभी जीव जंतुओं के बाहरी एवं अंदरूनी अस्तित्व को समायोजित करती है, अर्थात प्राण-वायु, इन्द्रियां, एवं मन के क्रिया-क्षेत्र।
यह श्लोक एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक अन्वेषण कार्य का संभवनीय आधार बन सकता है। यह श्लोक हमें समझाता है कि कैसे नभस से सूक्ष्म रूप उद्भव होते हैं, उनके क्या लक्षण और क्रियाएं होती हैं, एवं कैसे इस सूक्ष्म रूप से स्पर्शनीय पदार्थ प्रकट होते हैं, जैसे कि वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी।
भागवतम् केवल इन आधारभूत पदार्थों की सूची नहीं देता, बल्कि काफी हद तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही समझाता है कि अस्तित्व के सबसे सूक्ष्म स्तर से लेकर ब्रह्माण्ड के खंडों तक कैसे पदार्थों का विकास होता है - यह सचमुच ही काफि विस्तृत एवं वैज्ञानिक है। फिर भी, द्रव्यों के इस ज्ञान का पूरा फायदा उठाकर संसार की सृष्टि के रहस्य को खोलने के लिए आधुनिक विज्ञान को अपने ज्ञात पदार्थों की सारणी में केवल खम को ही नहीं बल्कि अहंकार, मन, एवं बुद्धि को भी जोडना होगा। क्योंकि वाकई, भगवद्गीता इन्हें भौतिक पदार्थ ही कहती है। इसके अलावा, अहंकार, मन, और बुद्धि को खम से भी सूक्ष्म श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है, क्योंकि लक्षण से ही ये पदार्थ, आत्मा के लक्षणों के बहुत समीप हैं।
स्थूल और सूक्ष्म भौतिक पदार्थों को वैज्ञानिक आवर्त सारणी में जोडने के अतिरिक्त, भगवद्गीता में यह भी कहा गया है कि आत्मा (चेतना) और परमात्मा (परम चेतना) - इन दो दिव्य एवं भौतिक-विरोधी अवधारणाओं को जोड़े बिना, अस्तित्व और वास्तव को पूरी तरह से समझना सम्भव नहीं है। ऐसा लगता है कि ‘डार्क मैटर’ से भी अधिक, आधुनिक-विज्ञान इस तत्त्व से जूझ रहा है। हमने इस तत्त्व को ‘लाइट मैटर’ का नाम दिया है।
मन और बुद्धि को आत्मा मानकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। असल में मन और बुद्धि जड़ पदार्थों से उद्भव नहीं होते, हालांकि कुछ दार्शनिक यही सुझाव देते हैं। सूची के अंत में है अहंकार (मिथ्या अहंकार)। ये सब भौतिक पदार्थ हैं जो श्री कृष्ण की अप्रधान शक्ति अपरा प्रकृति द्वारा प्रकट किए जाते हैं। ये स्थूल और सूक्ष्म पदार्थ भौतिक शरीर को बनाते हैं और इस तरह आत्मा को आच्छादित करते हैं।
भौतिक पदार्थों से प्रतिबंधित जीव स्वयं को अपना शरीर मानते हैं। किंतु कृष्ण कहते हैं कि उनकी एक और शक्ति है - एक उत्कृष्ट शक्ति, जो चेतन शक्ति है, और सभी जीवात्माएं इसी में शामिल होते हैं।
भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से स्थूल एवं सूक्ष्म भौतिक पदार्थ, और साथ साथ चेतना एवं परम-चेतना, दोनों की व्याख्या दी गई है। जो कोई सिद्धांत इन तत्त्वों को शामिल नहीं करते, वे अधूरे हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥७-७॥
mattaḥ parataraṁ nānyatkiñcidasti dhanañjaya | mayi sarvamidaṁ protaṁ sūtre maṇigaṇā iva || 7-7 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
धनञ्जय, कुछ भी मुझ से श्रेष्ठ नहीं है। जिस प्रकार मोती धागे में गुंथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥७-८॥
raso'hamapsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ | praṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṁ nṛṣu || 7-8 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे कुंती पुत्र, मैं ही जल का स्वाद एवं सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हूँ, मैं सभी वेदों में पाया जाने वाला अक्षर, ‘ॐ’ हूँ, मैं नभ (आकाश) में ध्वनि हूँ, और मैं ही पुरुष में पुरुषत्व हूँ।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥७-९॥
puṇyo gandhaḥ pṛthivyāṁ ca tejaścāsmi vibhāvasau | jīvanaṁ sarvabhūteṣu tapaścāsmi tapasviṣu || 7-9 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मैं पृथ्वी की मौलिक महक हूँ, मैं अग्नि का तेजस हूँ। मैं ही सभी प्राणियों का जीवन एवं तपस्वियों का तप हूँ।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥७-१०॥
bījaṁ māṁ sarvabhūtānāṁ viddhi pārtha sanātanam | buddhirbuddhimatāmasmi tejastejasvināmaham || 7-10 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यह जानो हो कि मैं ही सभी जीवों का मूल कारण हूँ। मैं ही बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वी व्यक्तियों का तेजस हूँ।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥७-११॥
balaṁ balavatāṁ cāhaṁ kāmarāgavivarjitam | dharmāviruddho bhūteṣu kāmo'smi bharatarṣabha || 7-11 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मैं बलवानों की महत्वाकांक्षा व लगाव से रहित बल हूँ। हे भरतश्रेष्ठ! मैं ऐसी प्रजनन की कामना हूँ, जो धर्म के विरुद्ध ना हो।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥७-१२॥
ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye | matta eveti tānviddhi na tvahaṁ teṣu te mayi || 7-12 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यह भी जान लो कि सभी चीजें जो सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण से उत्पन्न होते हैं, मैं ही उनका उद्गम हूँ। हालांकि मैं उनमें नहीं हूँ, लेकिन वे मुझ में निहित हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥७-१३॥
tribhirguṇamayairbhāvairebhiḥ sarvamidaṁ jagat | mohitaṁ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayam || 7-13 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
सारा संसार प्रकृति के इन तीन गुणों (सात्विक, राजसिक एवं तामसिक) से मोहित है। इसलिए, कोई भी मुझे जान नहीं सकता क्योंकि मैं प्रकृति के इन गुणों के परे एवं अपरिवर्ती हूँ।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 13 के पश्चात चिंतन
प्राचीन काल से ही, ज्ञान और मतलब की खोज में हमें वही मूलभूत प्रश्न मिलते हैं - हम कौन हैं? हम कहां से आए हैं? हम यहां क्यों आए हैं? हमें अपना आचरण कैसे करना चाहिए? क्या मृत्यु के बाद जीवन है? हमारे पूर्वजों के मन में ये सवाल थे और आज भी हम यही सवाल पूछते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर की खोज एक बुद्धिमान व्यक्ति को इस निष्कर्ष पर ले जाती है कि चेतना, जड़ पदार्थ से श्रेष्ठ है, एवं निश्चय ही एक ऐसा पूर्ण (परम) स्रोत होना चाहिए जहां से ब्रह्मांड के भीतर और उससे परे का सब कुछ उत्पन्न होता है।
यहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं ही हर वस्तु के एकमात्र कारण हैं और कुछ भी उनसे श्रेष्ठ नहीं है। वे ब्रह्मांड और सभी जीवित प्राणियों के कुल जोड़ हैं, लेकिन परम पुरुष के रूप में वे सभी वस्तुओं से अलग हैं।
सभी योग पद्धतियों में हम पाते हैं कि मंत्रों के जाप की अत्यधिक अनुशंसा की जाती है और संभवतः कोई भी मंत्र ॐ, या ओमकार से अधिक नहीं जपा जाता। इस ओमकार को अक्षरों (आ, ऊ और अं) के सर्वोच्च संयोजन के रूप में वर्णित किया गया है और इस प्रकार यह प्राथमिक वैदिक मंत्र है। यहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही वैदिक मंत्रों में पाए जने वाले ॐ हैं, इसलिए, ॐ का जप करते समय श्री कृष्ण पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। इस बात के समर्थन में ऋग्वेद में इस प्रकार कहा गया है -
ॐ इत्येतद् ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम यस्माद् उच्चार्यमाण ।
एव संसार-भयात् तारयति तस्मादुच्यते तार इति ॥
ॐ आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन महस्ते विष्णो
सुमतिं भजामहे ॐ तत् सत् ।
ततोऽभूत् त्रिवृदोंकारो योऽव्यक्त प्रभवः स्वराट् ।
यत्तल्लिङ्गं भगवतो ब्रह्मणः परमात्मनः ॥
जो ॐ का जप करता है, जो की ब्रह्मज्योति का निकटतम रूप है, वह ब्रह्मज्योति की ओर जाता है। यह एक व्यक्ति को भौतिक दुनिया के भय से मोक्ष प्रदान करता है। इसलिए इसे तारक-ब्रह्मन कहते हैं।
हे विष्णु/कृष्ण, आपका स्वयं-प्रकट नाम, ॐ, परिज्ञान का शाश्वत रूप है। भले ही इस नाम को सुनने की महिमा के बारे में मेरा ज्ञान अधूरा है, फिर भी, इस नाम के उच्चारण के अभ्यास से, मैं पूर्ण ज्ञान प्राप्त करूँगा।
वे जिनके पास अव्यक्त शक्तियां हैं और जो पूरी तरह से स्वतंत्र हैं वे ओंकार के स्पंदन को प्रकट करते हैं, जिससे वे खुद को ही इंगित (सूचित) करते हैं। वे स्वयं को ब्रह्मन, परमात्मा एवं भगवान् के तीन रूपों में व्यक्त करते हैं। (ऋग्वेद १.१५६.३)
अब यह प्रश्न उठ सकता है की ॐ श्री कृष्ण से अलग नहीं है (ॐ श्री कृष्ण का ही रूप है) तो महामंत्र का जप करने की क्या आवश्यकता है? महान आचार्य जैसे की जीव गोस्वामी, विश्वनाथ चक्रवर्ती, भक्तीविनोद, सरस्वती ठाकुर, स्वामी भक्तिरक्षक श्रीधर, भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद एवं अन्य सभी इस बात से सहमत हैं की ॐ भौतिक बन्धनों से मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करने तक सहायक है। लेकिन महामंत्र का जाप हमें मोक्ष से आगे ले चलता है, और हममे श्रीकृष्ण के लिए स्वाभाविक प्रेम जागृत करता है। मंत्रों की तात्त्विकी विज्ञानं में यह कहा गया है कि ‘ॐ’ श्रीकृष्ण की बांसुरी से उत्पन्न होता है; उसके बाद यह गायत्री मंत्र के रूप में प्रकट होता है, फिर वेद, वेदांत और श्रीमद्भागवतम् के रूप में प्रकट होता है। श्रीमद्भागवतम् के अंतिम श्लोक में महामंत्र के जप की अनुशंसा की गई है।
नाम-सङ्कीर्तनं यस्य सर्व पाप प्रणाशनम् ।
प्रणामो दुःख शमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥
महा-मंत्र का जाप हमें सभी अवांछनीय आदतों, सभी बुरे लक्षण, और सभी दुःखों से छुटकारा दिला सकता है। महा-मंत्र का जाप करें! और कुछ भी आवश्यक नहीं है। इसे अपनाइए! महा-मंत्र का जप करें और कलियुग के इस अंधकारमय युग में अपने सच्चे जीवन को व्यापक आस्तिकता के संकल्प के साथ शुरू करें। आइए हम सभी श्रीकृष्ण को नमन करें। (श्रीमद्भागवतम् १२.१३.२३)।
कोई भी ॐ का जप कर सकता और सभी को निश्चित रूप से महा-मंत्र का जप करना चाहिए। जो भी व्यक्ति एक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में महा-मंत्र का जप करते हैं वे निश्चित रूप से आत्म-साक्षात्कार के फल का आस्वादन करेंगे।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥७-१४॥
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā | māmeva ye prapadyante māyāmetāṁ taranti te || 7-14 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मेरी दैवी शक्ति, जिस के अंतर्गत त्रिगुणात्मक भौतिक प्रकृति है, इसे परास्त करना अत्यंत ही कठिन है। किन्तु जो लोग मेरी शरण में आते हैं, वे इसे पार कर सकते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 15
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥७-१५॥
na māṁ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ | māyayāpahṛtajñānā āsuraṁ bhāvamāśritāḥ || 7-15 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मूर्ख, सबसे नीच, जिनका ज्ञान भ्रम से आच्छादित है, और जो लोग अधार्मिक कार्यों में लगे रहते हैं - इन तरह के अधर्मी व्यक्तियां कभी भी मुझ पर समर्पण नहीं करते।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 16
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥७-१६॥
caturvidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛtino'rjuna | ārto jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha || 7-16 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के भाग्यशाली व्यक्ति मुझे पूजते हैं - वे जो दुःखी हैं, जो जिज्ञासु हैं, जो धन चाहते हैं, और वे जो आत्म-साक्षात्कार की इच्छा रखते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥७-१७॥
teṣāṁ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate | priyo hi jñānino'tyarthamahaṁ sa ca mama priyaḥ || 7-17 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
इनमें से, जो आत्म-साक्षात्कार की इच्छा रखता है वह श्रेष्ठ है। वह सदा मेरे विचारों में लीन रहता है और भक्ति-योग में लगा रहता है। मैं उसे बहुत प्रिय हूँ और वह मुझे बहुत प्रिय है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥७-१८॥
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam | āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṁ gatim || 7-18 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
निस्संदेह वे सभी धार्मिक हैं, फिर भी मैं आत्मबोध-युक्त ज्ञानी को अपना स्व मानता हूँ, क्योंकि उसका मन अपने अंतिम लक्ष्य के रूप में मुझ में ही पूर्ण रूप से अचल है।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 18 के पश्चात चिंतन
यहाँ श्रीकृष्ण अपनी आंतरिक शक्ति योग-माया और महा-माया के बीच अंतर बताने के लिए अपनी माया शक्ति के बारे में बताते हैं, जिसे महा-माया भी कहा जाता है। महा-माया वह भौतिक त्रिगुणात्मक शक्ति है, जो सभी जीवित प्राणियों को इस भौतिक अस्तित्व के अनुकूल बनाती है, एवं उन्हें इस संसार से बांधे रखती है। भगवद्गीता के अध्याय १४ में प्रकृति के इन तीन गुणों के विषय पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
श्री कृष्ण कहते हैं कि बद्ध-जीवों के लिए भौतिक प्रकृति के इन गुणों से पार होना अत्यंत ही कठिन होता है, लेकिन जो भक्ति-योग में श्रीकृष्ण की शरण लेते हैं वे आसानी से इसको पार कर जाते हैं। यह निम्नानुसार अनुशंसित है -
अकामः सर्व-कामो वा मोक्ष-काम उदार-धीः ।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥
चाहे कोई अकाम हो या सभी कामनाओं से भरपूर हो, या मोक्ष की इच्छा रखता हो - हर किसी को भक्ति-योग द्वारा परम पुरुष का शरण लेना चाहिए। (श्रीमद्भागवतम् २.३.१०)
श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि धर्मपरायण व्यक्ति (व्यथित, जिज्ञासु, धन चाहने वाले और आत्म-साक्षात्कार की इच्छा रखने वाले) उनका आश्रय लेते हैं, लेकिन, श्रीकृष्ण कहते हैं की इनमें से जो ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की खोज में है वह सबसे श्रेष्ठ हैं।
धन के लिए, जिज्ञासा से या दुःख के कारण जो श्रीकृष्ण की शरण में आते हैं, यह अक्सर देखा जाता है कि ऐसे व्यक्ति फिर से अपनी सामान्य गतिविधियों को शुरू कर देते हैं। जो लोग ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार के लिए श्रीकृष्ण के पास आते हैं, वे वास्तव में भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं और शाश्वत परम सुख को प्राप्त करते हैं। अंततः वे कृष्ण के परम धाम को प्राप्त करते हैं एवं इस जन्म और मृत्यु की संसार में कभी वापस नहीं लौटते हैं, जो कि अध्याय १५ में बताया जाएगा। इसलिए आत्म-साक्षात्कार के साधक जो श्रीकृष्ण का आश्रय लेते हैं और अपने सभी विचारों और कर्मों को श्रीकृष्ण में आत्मसात कर लेते हैं, उन्हें धार्मिक व्यक्तियों (पुण्यात्माओं) में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥७-१९॥
bahūnāṁ janmanāmante jñānavānmāṁ prapadyate | vāsudevaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ || 7-19 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
अनेक जन्मों के पश्चात, जो ज्ञानवान है, वह मुझ पर आत्मसमर्पण करता है। वह जान लेता है कि वासुदेव ही समस्ती के मूल स्रोत हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व बहुत ही दुर्लभ होते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥७-२०॥
kāmaisttaistairhṛtajñānāḥ prapadyante'nyadevatāḥ | taṁ taṁ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā || 7-20 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जिनकी बुद्धि विभिन्न भौतिक इच्छाओं के कारण मारी गई है वे अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं। अपने स्वभाव के अनुसार वे विभिन्न अनुष्ठान करते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥७-२१॥
yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati | tasya tasyācalāṁ śraddhāṁ tāmeva vidadhāmyaham || 7-21 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
व्यक्ति जिस देवी-देवता के स्वरूप की आस्था के साथ पूजा करने की इच्छा रखता है, मैं उस विशेष रूप के लिए उसकी श्रद्धा को मजबूत बनाता हूँ।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥७-२२॥
sa tayā śraddhayā yuktastasyārādhanamīhate | labhate ca tataḥ kāmānmayaiva vihitānhi tān || 7-22 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो श्रद्धा के साथ उस विशेष रूप की पूजा करता है, वह अपनी इच्छाओं की पूर्ती मेरी अनुमति के कारण ही प्राप्त करता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 23
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥७-२३॥
antavattu phalaṁ teṣāṁ tadbhavatyalpamedhasām | devāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi || 7-23 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
परन्तु, अल्पबुद्धि व्यक्तियों द्वारा प्राप्त ये परिणाम अस्थायी होते हैं। जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वे उन्हीं के निकट पहुँचते हैं, किंतु मेरे भक्त मुझे प्राप्त करते हैं।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 23 के पश्चात चिंतन
एक ही जीवनकाल में अपने आपको श्रीकृष्ण को समर्पित कर देना कदाचित संभव नहीं है। वस्तुतः श्रीकृष्ण यह कहते हैं की अनेक जन्म-जन्मान्तर में ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही कोई व्यक्ति वासुदेव (श्रीकृष्ण) को ही सर्वस्व का उद्गम जानते हुए उन पर आत्मसमर्पण करता है। सचमुच ही ऐसे व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ होते हैं - स महात्मा सुदुर्लभः।।
वस्तुतः ‘महात्मा’ शब्द का अर्थ है एक महान व्यक्तित्व या एक महान कृष्ण-भक्त, परन्तु, मात्र लोगों के विचारहीन समर्थन द्वारा महात्मा का मोहर लगवा लेने से कोई महात्मा नहीं बन जाता। महात्मा होने के लिए कुछ आवश्यक लक्षण व्यक्ति में होने चाहिए, और जिनमें ये लक्षण देखे जाएं, केवल उनका ही महात्मा शब्द द्वारा सम्मान किया जाना चाहिए। इन लक्षणों का चैतन्य चरितामृत में इस प्रकार उल्लेख है -
कृपालु अकृत-द्रोह सत्य-सार सम
निर्दोष वदान्य मृदु शुचि अकिञ्चन ।
सर्वोपकारक शांत कृष्णैक-शरण
अकाम अनीह स्थिर विजित-षड्-गुण ॥
मित-भुक अप्रमत्त मानद अमानी ।
गम्भीर करुण मैत्र कवि दक्ष मौनी ॥
कृष्ण के भक्त सदैव दयालु, विनम्र, सत्यप्रिय और सभी के लिए समान, दोषरहित, उदारचरित, सौम्य और स्वच्छ होते हैं। वे अकिंचन (निर्धन) होते हैं, और सभी के लिए कल्याणकारी कार्य करते हैं। वे शांत होते हैं, कृष्ण पर आत्मसमर्पित होते हैं, और इच्छा रहित होते हैं। वे भौतिक संपत्ति के अधिग्रहण से उदासीन रहते हैं, और कृष्ण की भक्ति में दृढ़ रहते हैं। वे पूरी तरह से छह बुरे गुणों को नियंत्रित करते हैं - काम, क्रोध, लालच आदि। वे केवल उतना ही खाते हैं जितना आवश्यक हो, और वे झूठे अहंकार के नशे से रहित होते हैं। वे सम्मानजनक, गंभीर, करुणामय और बिना झूठी प्रतिष्ठा के होते हैं। वे मित्रतापूर्ण, काव्यगत, निपुण, और मौनी होते हैं। (चैतन्य चरितामृत, मध्य-लीला २२.७८-८०)
समकालीन समय में भक्ति आंदोलन की लोकप्रियता में शिव, गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी आदि जैसे कई देवी-देवताओं की पूजा शामिल हो गई है, हालांकि, भगवद्गीता के अनुसार, विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा श्रीकृष्ण के समान नहीं, और ये किसी को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर कोई सहायता नहीं करता। भक्ति-योग केवल कृष्ण के लिए है। भक्ति, कृष्ण और उनके भक्तों के बीच पारस्परिक संबंध है, एवं भक्ति अन्य देवताओं की पूजा के साथ असंगत है।
ऐसा नहीं है कि अन्य देवी-देवताएं मिथ्या हैं, लेकिन वे किसी को भौतिक बन्धनों से मुक्ति प्रदान नहीं कर सकते हैं। कृष्ण जानते हैं कि सभी जीवित प्राणियों की सर्वोच्च भलाई के लिए क्या आवश्यक है और इसलिए वे कहते हैं कि देवताओं की पूजा करना नासमझी है।
यह भी कहा जा सकता है कि जो लोग अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण की ही पूजा करते हैं, क्योंकि विश्व-संबंधी मामलों के प्रबंधन के लिए वे कृष्ण के प्रतिनिधि हैं। इस तरह से अन्य देवी-देवताओं की पूजा भी श्रीकृष्ण की ही पूजा है, किंतु इनमें मोक्ष का फल प्राप्त नहीं होता। केवल कृष्ण को ही मुक्ति-पद या मुक्ति के दाता - मुकुंदा, कहा जाता है। पद्म-पुराण में शिवजी कहते हैं -
मुक्ति प्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः ।
निस्संदेह, विष्णु (कृष्ण) सभी के लिए मुक्ति के एकमात्र दाता हैं। (पद्म-पुराण ६.२५३.१७६)
जब जन्म और मृत्यु के चक्र से निकलने के लिए केवल श्रीकृष्ण पर आत्मसमर्पण ही एकमात्र आश्रय है, तो इसी में समझदारी है कि व्यक्ति को श्रीकृष्ण का आश्रय लेना चाहिए और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करना छोड़ देना चाहिए।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 24
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥७-२४॥
avyaktaṁ vyaktimāpannaṁ manyante māmabuddhayaḥ | paraṁ bhāvamajānanto mamāvyayamanuttamam || 7-24 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मेरा स्वभाव शाश्वत, सर्वोत्तम और अविनाशी है। तदापि अल्पबुद्धि इसे समझ नहीं सकते हैं, और इस प्रकार मेरी पहचान करते हैं कि किसी अवैयक्तिक तत्त्व ने अब एक भौतिक (अशाश्वत) स्वरूप धारण कर लिया है।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥७-२५॥
nāhaṁ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ | mūḍho'yaṁ nābhijānāti loko māmajamavyayam || 7-25 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
मैं सभी के लिए प्रकट नहीं होता। मैं अपनी योग-माया शक्ति से प्रच्छन्न हूँ, और इसलिए मूर्ख मुझे शाश्वत और अजन्मे के रूप में नहीं पहचान सकते।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 25 के पश्चात चिंतन
यहाँ श्रीकृष्ण अपनी स्थिति काफी स्पष्ट रूप से बताते हैं। वे अनंत, अजन्मे, सर्वोत्तम और अविनाशी हैं। वे यह भी कहते हैं कि जो लोग मूर्ख हैं, वे दुनिया में उनके आविर्भाव को अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति (ब्रह्मन) का अस्थायी भौतिक रुप मानते हैं। ऐसे पथभ्रष्ट दार्शनिक मानते हैं कि श्रीकृष्ण का शरीर भौतिक है और कृष्ण, अन्य जीवित प्राणियों की तरह ही ब्रह्म-ज्योति से प्रकट हुए हैं। भगवद्गीता के अध्याय १४ में, कृष्ण बताते हैं कि वे स्वयं ही ब्रह्म-ज्योति के एकमात्र स्रोत हैं और सभी जीवित प्राणी उन्ही से उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण अपने आपको सभी के लिए व्यक्त या प्रकट नहीं करते - विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो उनसे ईर्ष्या या द्वेष की भावना रखते हैं। ईर्ष्यालु के लिए कृष्ण अपनी आध्यात्मिक शक्ति, ‘योग-माया’ द्वारा आच्छादित हो जाते हैं, और साथ ही साथ ईर्ष्यालु जन्म और मृत्यु के चक्र में ‘महा-माया’ द्वारा आच्छादित हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 26
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥७-२६॥
vedāhaṁ samatītāni vartamānāni cārjuna | bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṁ tu veda na kaścana || 7-26 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे अर्जुन, मैं भूत, वर्तमान एवं भविष्य को जानता हूँ। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥७-२७॥
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata | sarvabhūtāni sammohaṁ sarge yānti parantapa || 7-27 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
हे शत्रु विजयी, सृष्टि के आरम्भ में सभी जीव इच्छा और घृणा के द्वन्द्वों से व्यग्र होकर जन्म लेते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 28
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥७-२८॥
yeṣāṁ tvantagataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇyakarmaṇām | te dvandvamohanirmuktā bhajante māṁ dṛḍhavratāḥ || 7-28 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
यद्यपि, जो लोग पुण्य कार्य करते हैं वे सभी प्रतिक्रियाओं से शुद्ध हो जाते हैं - वे द्वन्द्वों के भ्रम से मुक्त हो जाते हैं और दृढ़-निष्ठा से मेरी पूजा करते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 29
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥७-२९॥
jarāmaraṇamokṣāya māmāśritya yatanti ye | te brahma tadviduḥ kṛtsnamadhyātmaṁ karma cākhilam || 7-29 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो लोग मेरा आश्रय लेकर वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्त होने का प्रयास करते हैं, वे परम सत्य, व्यक्तिगत आत्मा और कर्म व कर्म की प्रतिक्रिया के नियमों को जानते हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 30
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥७-३०॥
sādhibhūtādhidaivaṁ māṁ sādhiyajñaṁ ca ye viduḥ | prayāṇakāle'pi ca māṁ te viduryuktacetasaḥ || 7-30 ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
जो मुझे भौतिक द्रव्य के नियंता, देवताओं के नियंता एवं सभी यज्ञो के भोक्ता के रूप में जानते हैं – मृत्यु के समय अपने मन को मुझ पर केन्द्रित करके वे मुझे जान जाते हैं।
ॐ
अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार
श्लोक 30 के पश्चात चिंतन
वैदिक साहित्य के बाहर भगवद्गीता का ज्ञान नहीं पाया जाता। गीता के सम्मुख संसार के किसी भी साहित्यिक स्रोत की तुलना हो ही नहीं सकती। श्रीकृष्ण की दिव्यता को इतनी स्पष्टता और निर्भीकता के साथ बताया गया है कि योग के एक गंभीर छात्र के मन में कोई भी संदेह नहीं रह सकता। श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह नित्य, अजन्मे, सर्वोत्तम और अविनाशी हैं। वे भूत, वर्तमान और भविष्य को जानते हैं; वे सभी जीवों को जानते हैं और जो लोग उन पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, यह जानते हुए कि वे ही हर वस्तु के नियंता हैं, उन्हें इस भौतिक जगत में फिर से जन्म नहीं लेना पड़ता।
श्रीमद्भागवत महापुराण
अध्याय 7 • श्लोक क्रमांक 31
ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां
वैयासिक्यां भीष्मपर्वाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥
oṁ tatsaditi śrīmahābhārate śatasāhasryāṁ saṁhitāyāṁ vaiyāsikyāṁ bhīṣmaparvāṇi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṁ yogaśāstre śrīkṛṣṇārjunasaṁvāde jñānavijñānayogo nāma saptamo'dhyāyaḥ ||
सरल भावार्थ (हिंदी):
ॐ तत् सत् - अतः व्यास विरचित शतसहस्र श्लोकों की श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में पाए जाने वाले आध्यात्मिक ज्ञान का योग-शास्त्र - श्रीमद् भगवद् गीतोपनिषद् में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से लिए गए ज्ञान-विज्ञान योग नामक सातवें अध्याय की यहां पर समाप्ती होती है।